गुलदारों का बदलता व्यवहार: खेतों और गांवों में नई चुनौती
बिजनौर और आसपास के जिलों में गुलदारों (भारतीय तेंदुए) का जंगलों से निकलकर खेतों और गांवों की ओर रुख करना अब आम हो गया है। भारतीय वन्यजीव संस्थान (WII) और वन विभाग के हालिया सर्वेक्षणों ने इस बदलाव को विस्तार से दर्ज किया है। रिपोर्ट बताती है कि इंसानी बस्तियों के पास रहने वाले गुलदारों का वजन बढ़ रहा है, उनकी फुर्ती घट रही है और उनका व्यवहार पहले से कहीं अधिक निडर हो गया है।
बदलाव की वजह
- बाघों की बढ़ती संख्या: 2016 के आसपास अमानगढ़ टाइगर रिजर्व में बाघों की संख्या बढ़ने लगी। प्रतिस्पर्धा और दबाव के कारण गुलदारों ने जंगल छोड़कर बाहर का रास्ता चुना।
- आसान शिकार: गांवों और खेतों में पालतू जानवर, कुत्ते और अन्य छोटे जीव गुलदारों के लिए आसान शिकार साबित हो रहे हैं।
- खतरे का अभाव: इंसानी बस्तियों में गुलदारों को न तो बाघों का डर है और न ही शिकार की कमी। यही कारण है कि वे आराम से खेतों और गांवों में घूमते हैं।
व्यवहार में बदलाव
- पहले गुलदार रोशनी या तेज आवाज सुनकर भाग जाते थे। अब टॉर्च, हेडलाइट या गाड़ी के हॉर्न से भी वे नहीं डरते।
- कई मामलों में गुलदार रात में बाइक सवारों पर हमला कर रहे हैं।
- सीसीटीवी फुटेज में गुलदार गांवों में आराम से घूमते और बैठते हुए दिखे हैं।
शारीरिक बदलाव
- सामान्यतः गुलदार का वजन 60–65 किलो होता है।
- हाल ही में पकड़े गए गुलदारों का वजन 95–97 किलो तक पाया गया।
- वजन बढ़ने के साथ उनकी फुर्ती और लचीलापन कम हो रहा है।
- विशेषज्ञों का मानना है कि खेतों में जन्म लेने वाली नई पीढ़ी और भी भारी व आलसी हो सकती है।
विशेषज्ञों की राय
विशेषज्ञों का कहना है कि इंसानी बस्तियों के पास गुलदारों को आसान शिकार और सुरक्षित माहौल मिल रहा है। यही कारण है कि उनकी जीवनशैली बेपरवाह और आलसी होती जा रही है।
खतरे और चुनौतियाँ
- इंसानों के साथ सीधा सामना बढ़ रहा है।
- ग्रामीणों की सुरक्षा पर खतरा मंडरा रहा है।
- वन विभाग को गुलदारों के व्यवहार पर लगातार निगरानी रखनी पड़ रही है।









