गुरु गोबिंद सिंह जी और पंज प्यारे की कथा, गुरुद्वारों की रौनक और बैसाखी का उत्साह

बैसाखी का पर्व सिख धर्म के लिए बहुत महत्वपूर्ण है। यह पर्व न केवल फसलों के पकने का संकेत देता है, बल्कि यह सिख धर्म के नववर्ष का भी प्रतीक है। 1699 में सिखों के दसवें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने खालसा पंथ की स्थापना की थी। बैसाखी का पवित्र त्योहार जो हर साल 13 या 14 अप्रैल को मनाया जाता है। सिखों के 10वें गुरु, गुरु गोबिंद सिंह जी ने इस दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी।

सिखो के नानकशाही कैलेंडर के मुताबिक आज के दिन खालसा साजना दिवस मनाया जाता है। सिख पंथ के प्रगट स्थान श्री आनंदपुर साहिब (पंजाब ) वह स्थान है, जहाँ साहिब-ए-कमाल श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने सन् 1699 की वैसाखी वाले दिन खालसा पंथ की सृजना की थी और पंज प्यारों को अमृत छकाया था व सिंह सजाया था। उसी दिन से ही हर साल यह खालसा साजना दिवस मनाया जाता है। वैसाखी वाले दिन दशम पिता श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने सन् 1699 ई. में श्री आनंदपुर साहिब में बड़ी सभा बुलाई जिसमें संगत को बढ़-चढ़कर हिस्सा लेने का हुक्म जारी किया। फिर इस दिन श्री आनंदपुर साहिब में बड़ा दीवान सजा। कीर्तन के उपरांत गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी कृपाण म्यान से निकाली और गरज कर कहा कि कोई है जो गुरु साहिबान के आशय, निशानों के लिए त्याग दे दे।

यह सुनकर सभा में सन्नाटा छा गया। तीसरी बार आवाज़ देने पर लाहौर के भाई दया राम ने शीश भेंट किया। गुरु जी उन्हें अपने साथ तंबू में ले गए। फिर दूसरी बार में हस्तिनापुर के रहने वाले भाई धरम सिंह, तीसरी बार में जगन्नाथ पुरी (ओडिशा) के एक रसोइया सिख हिम्मत राय, चौथी बार में द्वारका (गुजरात) के एक छींबा मोहकम चंद और पाँचवीं बार बीदर (कर्नाटक) के एक भाई साहिब चंद ने अपना-अपना शीश भेंट किया।

गुरु गोबिंद सिंह जी ने सुंदर पोशाक पहनाकर तंबू से बाहर उन पाँचों को संगत के सामने लाए। अमृत तैयार किया और पाँचों सिखों को छका कर ‘सिंह’ सजने का मान दिया और इन्हें पंज प्यारे कहा। फिर उन पाँचों सिंहों से खुद अमृत छका। अब जात , गैर-जात, ऊँची-नीची जाति,और गुरु-चेले का कोई अंतर नहीं रहा था। खालसा पंथ की स्थापना करते हुए गुरु गोबिंद सिंह जी ने नया पंथ सिरजा और जात-पात, रंग-भेद के भेदभाव को भी खत्म किया। गुरु साहिब ने अमृत छकाने के बाद पुरुषों के नाम के पीछे ‘सिंह’ और महिलाओं के नाम के पीछे ‘कौर’ लगाने का हुक्म दिया।

इसके अलावा, अमृत छकने वाले प्यारों के लिए केस, कंघा, कड़ा, कृपाण और कछहरा—पंज ककार भी सिंहों के पहनावे का ज़रूरी हिस्सा बनाया। यह रीति आज भी अमृत छकने वाले सिंह या कौर द्वारा पूरी रहत मर्यादा के साथ अपनाई जाती है। बैसाखी के मौके पर गुरुद्वारों को खूब सजाया जाता है। फूलों और लाइटों से गुरुद्वारों की रौनक देखने लायक होती है। इस दिन विशेष रूप से कीर्तन, गुरबाणी और लंगर का आयोजन किया जाता है। और लोग एक-दूसरे को बैसाखी की बधाई देते हैं।

हरमन्दर सिंह खासपुरा