सुप्रीम कोर्ट सख्त: रेप रोकना पुलिस की जिम्मेदारी, अपराधियों के मन में पैदा करें कानून का खौफ
रेप और यौन अपराधों पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- घटना के बाद गिरफ्तारी नहीं, अपराध होने से पहले रोकथाम जरूरी
दिल्ली-NCR में बढ़ते यौन अपराधों पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से पूछा- अपराध रोकने के लिए क्या ठोस कदम उठाए जा रहे हैं?
नई दिल्ली। दिल्ली-NCR में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ बढ़ते रेप और यौन हिंसा के मामलों पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर चिंता जताई है। मामले पर स्वत: संज्ञान लेकर सुनवाई करते हुए शीर्ष अदालत ने दिल्ली पुलिस को अपराधों की रोकथाम के लिए प्रभावी और जमीनी स्तर पर कदम उठाने के निर्देश दिए। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि किसी अपराध के बाद आरोपी को गिरफ्तार कर लेना ही पुलिस की पूरी जिम्मेदारी नहीं है। पुलिस की प्राथमिक जिम्मेदारी यह सुनिश्चित करना भी है कि अपराध होने ही न पाए।
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि रेप और यौन हिंसा जैसे अपराध किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार नहीं किए जा सकते। अदालत ने इस विषय को व्यापक स्तर पर आगे बढ़ाने की जरूरत बताई, ताकि भविष्य में ऐसे अपराधों को अधिक प्रभावी तरीके से रोका जा सके।
अपराध रोकने के लिए दिल्ली पुलिस क्या कर रही है?
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस से सीधे सवाल किया कि अपराधों की रोकथाम के लिए उसके स्तर पर क्या कदम उठाए जा रहे हैं। अदालत ने यह भी पूछा कि क्या राजधानी में अपराधों की लगातार निगरानी के लिए किसी तरह का वॉर रूम या केंद्रीकृत निगरानी तंत्र स्थापित करने की व्यवस्था है।
कोर्ट ने कहा कि देश के कुछ हाई कोर्ट स्तर पर इस तरह के निगरानी तंत्र विकसित किए गए हैं। ऐसे में दिल्ली में भी अपराध की स्थिति पर लगातार नजर रखने और संवेदनशील इलाकों में तुरंत कार्रवाई करने के लिए प्रभावी व्यवस्था पर विचार किया जाना चाहिए।
अदालत ने यौन अपराधियों से संबंधित उपलब्ध डेटाबेस का बेहतर इस्तेमाल करने पर भी जोर दिया। National Database on Sexual Offenders (NDSO) के माध्यम से यौन अपराधों में शामिल रहे लोगों की निगरानी और संबंधित सूचनाओं के प्रभावी उपयोग की दिशा में कदम उठाने को कहा गया।
सभी एजेंसियां मिलकर करें काम
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यौन अपराधों की रोकथाम किसी एक एजेंसी की जिम्मेदारी तक सीमित नहीं रह सकती। पुलिस, प्रशासन और अन्य संबंधित एजेंसियों को समन्वय के साथ काम करना होगा।
अदालत ने दिल्ली पुलिस को मामले के प्रत्येक पहलू पर गंभीरता से काम करने की हिदायत दी। कोर्ट ने कहा कि ऐसा नहीं होना चाहिए कि कुछ सप्ताह बाद फिर इसी तरह की घटनाएं सामने आएं और पुलिस को उसी समस्या का सामना करना पड़े।
सुप्रीम कोर्ट ने कॉलेजों और शैक्षणिक संस्थानों के आसपास के माहौल पर भी विशेष ध्यान देने को कहा। सुनवाई के दौरान यह बात सामने आई कि कुछ स्थानों पर छात्राओं को परेशान करने और उनका लगातार पीछा करने जैसी शिकायतें भी सामने आती हैं। अदालत ने ऐसे मामलों को गंभीरता से लेने की जरूरत बताई।
निर्भया कांड का भी आया जिक्र
सुनवाई के दौरान दिल्ली में बिना अनुमति संचालित हो रहे कुछ खाने-पीने के ठिकानों का मुद्दा भी उठा। कोर्ट को बताया गया कि राजधानी में बड़ी संख्या में ऐसे प्रतिष्ठान हैं, जहां असामाजिक तत्वों के जमा होने की शिकायतें सामने आती हैं। कुछ स्थानों पर शराब उपलब्ध कराए जाने की बात भी अदालत के सामने रखी गई।
इस पर जस्टिस जे.बी. पारदीवाला ने वर्ष 2012 के निर्भया कांड का संदर्भ दिया। अदालत में हुई चर्चा के मुताबिक, निर्भया मामले के रिकॉर्ड में आरोपियों के घटना से पहले खाना खाने और शराब पीने का उल्लेख था। कोर्ट ने संकेत दिया कि अपराध की रोकथाम के लिए ऐसे सामाजिक और स्थानीय कारकों पर भी ध्यान देना आवश्यक है।
कागजों पर नहीं, जमीन पर दिखने चाहिए कदम
सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि अपराध नियंत्रण के लिए केवल योजनाएं बनाना पर्याप्त नहीं होगा। पुलिस को उन योजनाओं को जमीन पर प्रभावी तरीके से लागू करना होगा।
अदालत ने कहा कि यदि अपराधों की रोकथाम के लिए अतिरिक्त और कठोर कदम उठाने की आवश्यकता है तो उससे पीछे नहीं हटना चाहिए। पुलिस की जिम्मेदारी कानून-व्यवस्था बनाए रखने के साथ-साथ लोगों को सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना भी है।
कोर्ट ने यह भी कहा कि पुलिस बल की कमी है तो नई भर्ती की प्रक्रिया शुरू की जानी चाहिए। इसके साथ ही पुलिसकर्मियों को बेहतर और नियमित प्रशिक्षण देने पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए।
अदालत ने माना कि पुलिस बल बढ़ाने और नई व्यवस्था को पूरी तरह लागू करने में समय लग सकता है, लेकिन तब तक अपराधों को रोकने के लिए उपलब्ध संसाधनों से तत्काल प्रभावी कदम उठाना जरूरी है।
अपराध के बाद कार्रवाई से ज्यादा जरूरी है अपराध की रोकथाम
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली पुलिस को स्पष्ट संदेश दिया कि अपराध होने के बाद आरोपी की गिरफ्तारी को ही सफलता नहीं माना जा सकता। पुलिस व्यवस्था का उद्देश्य ऐसा वातावरण तैयार करना होना चाहिए, जहां अपराध करने से पहले ही अपराधी कानून के डर से पीछे हट जाए।
अदालत ने कहा कि पुलिस को अपनी मौजूदगी और निगरानी इस तरह मजबूत करनी होगी कि संभावित अपराधियों के मन में कानून का खौफ बना रहे।
कोर्ट ने अधिकारियों की जवाबदेही तय करने पर भी जोर दिया। दिल्ली-NCR में दिन और रात दोनों समय संवेदनशील इलाकों में निगरानी बढ़ाने और पुलिस की सक्रियता सुनिश्चित करने की बात कही गई।
त्योहारों के दौरान विशेष सतर्कता के निर्देश
सुप्रीम कोर्ट ने आगामी त्योहारों, विशेष रूप से दिवाली के दौरान पुलिस को अतिरिक्त सतर्कता बरतने की हिदायत दी। अदालत ने कहा कि त्योहारों के समय भीड़ और सार्वजनिक गतिविधियां बढ़ जाती हैं और ऐसे समय में असामाजिक तत्व सक्रिय हो सकते हैं।
इसलिए पुलिस को संवेदनशील स्थानों, बाजारों, सार्वजनिक परिवहन और अन्य भीड़भाड़ वाले इलाकों में विशेष निगरानी रखनी चाहिए।
सार्वजनिक स्थानों और पार्कों में पर्याप्त रोशनी पर जोर
महिलाओं की सुरक्षा के लिए सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली के सार्वजनिक स्थानों और पार्कों में पर्याप्त रोशनी की व्यवस्था सुनिश्चित करने पर भी जोर दिया।
अदालत ने कहा कि अंधेरे और सुनसान स्थान अपराध के लिए अनुकूल परिस्थितियां पैदा कर सकते हैं। इसलिए पार्कों, सार्वजनिक रास्तों और अन्य संवेदनशील स्थानों पर पर्याप्त लाइटिंग व्यवस्था होनी चाहिए।
कोर्ट ने इस संबंध में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से भी आवश्यक कदम सुनिश्चित कराने को कहा।
महिलाओं को सुरक्षित महसूस कराने की जिम्मेदारी
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने महिलाओं की सुरक्षा को लेकर पुलिस की जिम्मेदारी को रेखांकित किया। अदालत ने कहा कि समाज में महिलाओं को ऐसा वातावरण मिलना चाहिए, जहां वे बिना डर के सार्वजनिक स्थानों पर आ-जा सकें।
कोर्ट ने उदाहरण देते हुए कहा कि यदि कोई महिला रात में बस में अकेले सफर कर रही है तो सार्वजनिक परिवहन और सुरक्षा व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए कि उसकी सुरक्षा सुनिश्चित की जा सके। पुलिस को केवल शिकायत आने के बाद प्रतिक्रिया देने के बजाय संभावित खतरे की पहचान कर पहले से कार्रवाई करने की दिशा में काम करना होगा।
अदालत ने यह भी कहा कि पुलिस को कानून के दायरे में रहते हुए प्रभावी और सख्त कार्रवाई करनी चाहिए। अपराधियों के मन में यह विश्वास होना चाहिए कि अपराध करने पर कानून उन्हें छोड़ेगा नहीं।
16 नवंबर को होगी अगली सुनवाई
सुप्रीम कोर्ट ने दिल्ली में महिलाओं और बच्चियों के खिलाफ यौन अपराधों की रोकथाम से जुड़े इस मामले में आगे की कार्रवाई जारी रखने के संकेत दिए हैं। मामले की अगली सुनवाई 16 नवंबर को होगी।
शीर्ष अदालत का जोर इस बात पर है कि दिल्ली-NCR में महिलाओं की सुरक्षा के लिए केवल घटना के बाद पुलिस कार्रवाई पर निर्भर रहने के बजाय एक ऐसी व्यवस्था विकसित की जाए, जिसमें अपराध की संभावना का पहले से आकलन कर उसे रोकने के लिए पुलिस और अन्य एजेंसियां सक्रिय रूप से काम करें।










