यूपी: मेरठ के नीरज चौहान ने एशियन गेम्स में जीते दो पदक, पिता की मेहनत और त्याग को मिली बड़ी कामयाबी
मेरठ। उत्तर प्रदेश के मेरठ के रहने वाले तीरंदाज नीरज चौहान ने एशियन गेम्स में शानदार प्रदर्शन करते हुए देश और अपने शहर का नाम रोशन किया है। नीरज ने रिकर्व तीरंदाजी की टीम स्पर्धा में रजत पदक जीतने के बाद व्यक्तिगत स्पर्धा में भी कांस्य पदक अपने नाम किया। उनकी इस उपलब्धि से मेरठ स्थित परिवार और परिचितों में खुशी का माहौल है।
नीरज की सफलता इसलिए भी खास है क्योंकि इसके पीछे उनके पिता अक्षय चौहान का लंबे समय तक किया गया संघर्ष और त्याग जुड़ा हुआ है। अक्षय चौहान कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम में करीब दो दशक तक मेस का संचालन करते रहे। इसी दौरान उन्होंने अपने बेटे को खेलों में आगे बढ़ाने का सपना देखा और सीमित संसाधनों के बावजूद उसे पूरा करने के लिए लगातार मेहनत की।
नीरज की मां परमशिला बेटे की अंतरराष्ट्रीय सफलता से बेहद भावुक हैं। पदक जीतने की खबर सुनकर उनकी आंखों में खुशी के आंसू आ गए। परिवार के लिए यह उपलब्धि वर्षों की मेहनत, संघर्ष और इंतजार का परिणाम है।
टीम स्पर्धा में रजत, व्यक्तिगत मुकाबले में कांस्य
एशियन गेम्स में नीरज चौहान ने पुरुष रिकर्व टीम स्पर्धा में धीरज और यशदीप के साथ भारतीय टीम का प्रतिनिधित्व किया। फाइनल मुकाबले में भारतीय टीम का सामना दक्षिण कोरिया से हुआ। कड़े मुकाबले में भारत को 1-5 से हार का सामना करना पड़ा, जिसके चलते टीम को रजत पदक से संतोष करना पड़ा।
इसके बाद नीरज ने व्यक्तिगत रिकर्व स्पर्धा में भी दमदार प्रदर्शन किया। उन्होंने कांस्य पदक के मुकाबले में धीरज बोम्मादेवरा को 6-4 से हराकर पदक अपने नाम किया। इस तरह नीरज ने एक ही एशियन गेम्स में दो पदक जीतकर अपनी प्रतिभा का शानदार प्रदर्शन किया।
व्यक्तिगत रिकर्व तीरंदाजी में एशियन गेम्स का पदक जीतने वाले नीरज दूसरे भारतीय पुरुष तीरंदाज बने। उनसे पहले 2010 के एशियन गेम्स में तरुणदीप राय ने इस स्पर्धा में रजत पदक हासिल किया था।
मेरठ के स्टेडियम से शुरू हुआ खेल का सफर
नीरज चौहान का खेलों से जुड़ाव बचपन से ही रहा है। उनका परिवार मूल रूप से गोरखपुर का रहने वाला है। उनके पिता अक्षय चौहान वर्ष 1990 में मेरठ आए थे और इसके बाद परिवार ने भी यहीं अपना ठिकाना बना लिया।
अक्षय ने नीरज को महज चार वर्ष की उम्र में खेलों की ओर प्रेरित करना शुरू कर दिया था। कैलाश प्रकाश स्पोर्ट्स स्टेडियम के आसपास का माहौल ही नीरज के शुरुआती खेल जीवन का आधार बना। उन्होंने शुरुआती दौर में अलग-अलग खेलों में हाथ आजमाया, लेकिन बाद में तीरंदाजी को अपना लक्ष्य बनाया।
प्रतिभा और मेहनत के आधार पर नीरज का चयन सोनभद्र के हॉस्टल में हुआ। वहां उन्हें तीरंदाजी का बेहतर प्रशिक्षण और प्रतिस्पर्धी माहौल मिला। इसके बाद उन्होंने लगातार अपने प्रदर्शन में सुधार किया और राष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बनाई।
जूनियर से सीनियर स्तर तक लगातार सफलता
नीरज ने जूनियर स्तर पर भी अपनी प्रतिभा का प्रदर्शन किया। वर्ष 2018 में उन्होंने जूनियर नेशनल प्रतियोगिता में रजत पदक जीता। इसके बाद सीनियर स्तर पर भी उनका प्रदर्शन जारी रहा और वर्ष 2021 में सीनियर नेशनल में रजत पदक हासिल किया।
लगातार अच्छे प्रदर्शन का फायदा उन्हें खेल कोटे के माध्यम से नौकरी के रूप में भी मिला। नीरज वर्तमान में भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (आईटीबीपी) में कार्यरत हैं और दिल्ली में तैनात हैं।
नीरज के परिवार में खेल प्रतिभा केवल उन्हीं तक सीमित नहीं है। उनके भाई सुनील भी बॉक्सिंग में सक्रिय हैं। सुनील ने भी खेल कोटे के माध्यम से पीएसी में नौकरी हासिल की है। इस तरह परिवार में खेलों को लेकर शुरू से ही एक सकारात्मक माहौल रहा है।
बेटे को आगे बढ़ाने के लिए पिता ने बेची सब्जियां
नीरज की मां परमशिला के अनुसार, उनके पति अक्षय चौहान ने स्टेडियम में मेस चलाते हुए खिलाड़ियों को करीब 20 वर्षों तक भोजन उपलब्ध कराया। खिलाड़ियों के साथ रहते हुए उन्हें समझ आया कि खेल प्रतिभाओं को सही दिशा और प्रोत्साहन मिले तो वे आगे चलकर बड़ा मुकाम हासिल कर सकते हैं।
इसी सोच के साथ उन्होंने अपने बच्चों को खेलों में आगे बढ़ाने का फैसला किया। परिवार की आर्थिक परिस्थितियां हमेशा आसान नहीं रहीं, लेकिन अक्षय ने बच्चों की ट्रेनिंग और खेल से जुड़े खर्चों को पूरा करने के लिए लगातार मेहनत की।
कोरोना काल के दौरान मेस का काम बंद होने के बाद परिवार की मुश्किलें और बढ़ गईं। आय का नियमित साधन समाप्त होने के बावजूद अक्षय ने हार नहीं मानी। परिवार चलाने और बच्चों की जरूरतें पूरी करने के लिए उन्होंने सब्जियां बेचने तक का काम किया।
परिवार के लिए आर्थिक संघर्ष भले ही कठिन रहा हो, लेकिन बच्चों के खेल करियर को लेकर उनका हौसला कभी कम नहीं हुआ। आज नीरज की अंतरराष्ट्रीय उपलब्धि उसी संघर्ष का परिणाम मानी जा रही है।
मां की आंखों में छलके खुशी के आंसू
नीरज की सफलता की खबर मेरठ स्थित परिवार तक पहुंची तो घर में खुशी का माहौल बन गया। बेटे के दो पदक जीतने पर मां परमशिला भावुक हो गईं। वर्षों तक बेटे को अभ्यास करते, प्रतियोगिताओं में हिस्सा लेते और सफलता के लिए संघर्ष करते देखने के बाद अब उन्हें अंतरराष्ट्रीय मंच पर उसकी उपलब्धि पर गर्व है।
परिवार के लिए नीरज की यह सफलता केवल दो पदकों तक सीमित नहीं है। यह उस संघर्ष की कहानी है जिसमें एक पिता ने मेस चलाने से लेकर सब्जी बेचने तक का काम किया, लेकिन बेटे के सपने को टूटने नहीं दिया।
संघर्ष से सफलता तक पहुंचने की प्रेरक कहानी
नीरज चौहान की कहानी यह बताती है कि सीमित संसाधन किसी प्रतिभा के रास्ते की अंतिम बाधा नहीं होते। परिवार का सहयोग, लगातार अभ्यास, सही प्रशिक्षण और लक्ष्य के प्रति समर्पण किसी खिलाड़ी को बड़े मंच तक पहुंचा सकता है।
मेरठ के स्टेडियम से खेलों का सफर शुरू करने वाले नीरज ने सोनभद्र में प्रशिक्षण लिया, राष्ट्रीय स्तर पर पदक जीते, खेल कोटे से सरकारी सेवा में पहुंचे और अब एशियन गेम्स में दो पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया है।
नीरज की उपलब्धि ने मेरठ के खेल जगत में भी नई उम्मीद जगाई है। उनकी सफलता उन युवाओं के लिए प्रेरणा है जो सीमित सुविधाओं के बावजूद खेलों में अपना करियर बनाने का सपना देखते हैं।








