संवैधानिक चेतना के महर्षि डॉ. सुभाष कश्यप नहीं रहे, बिजनौर ने अपना एक गौरवशाली पुत्र खो दिया

भारतीय संविधान की आत्मा को समझने और समझाने वाले, संसदीय परंपराओं के अप्रतिम व्याख्याकार तथा देश के सबसे प्रतिष्ठित संवैधानिक विशेषज्ञों में से एक डॉ. सुभाष सी. कश्यप के निधन का समाचार केवल एक व्यक्ति के अवसान का समाचार नहीं है, बल्कि भारतीय लोकतंत्र के एक जीवंत अध्याय के पूर्ण विराम की सूचना है। उनके जाने से संसद, संविधान और लोकतांत्रिक मूल्यों की वह पीढ़ी मानो इतिहास के पन्नों में सिमट गई है, जिसने स्वतंत्र भारत को आकार लेते अपनी आंखों से देखा था।

97 वर्ष की आयु में उनका निधन देश के बौद्धिक, राजनीतिक और विधिक जगत के लिए अपूरणीय क्षति है। लेकिन यह शोक केवल राष्ट्रीय स्तर पर नहीं है। उत्तर प्रदेश के बिजनौर जिले, विशेषकर चांदपुर की मिट्टी आज अपने उस सपूत को याद कर रही है, जिसने गांव-कस्बे की गलियों से निकलकर भारत के संविधान और संसद की सबसे विश्वसनीय आवाज बनने तक का असाधारण सफर तय किया।

बिजनौर की धरती ने अनेक साहित्यकार, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक दिए हैं, लेकिन डॉ. सुभाष कश्यप का योगदान उन्हें एक अलग पहचान देता है। वे उन विरले व्यक्तित्वों में थे जिनका नाम देश के किसी भी संवैधानिक विमर्श में सम्मान के साथ लिया जाता था। जब संसद में गतिरोध होता, जब राष्ट्रपति या राज्यपाल की संवैधानिक भूमिका पर प्रश्न उठते, जब सरकारों के गठन या पतन को लेकर कानूनी बहसें छिड़तीं, तब देश की निगाहें अक्सर डॉ. कश्यप जैसे विद्वानों की ओर उठती थीं।

उनका जीवन अपने आप में भारतीय संसदीय इतिहास का एक सजीव दस्तावेज था। उन्होंने पंडित जवाहरलाल नेहरू के नेतृत्व वाली पहली लोकसभा से लेकर नौवीं लोकसभा तक भारतीय संसद को बेहद करीब से देखा। लगभग चार दशकों की उनकी संसदीय सेवा ने उन्हें संविधान और लोकतंत्र का चलता-फिरता विश्वकोश बना दिया था। वर्ष 1983 से 1990 तक लोकसभा महासचिव के रूप में उन्होंने जिस निष्पक्षता, विद्वता और गरिमा के साथ अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन किया, वह आज भी संसदीय इतिहास में एक आदर्श माना जाता है।

कम लोग जानते हैं कि संविधान के इस महान अध्येता की जड़ें स्वतंत्रता आंदोलन से भी गहराई से जुड़ी थीं। बिजनौर के एक स्वतंत्रता सेनानी परिवार में जन्मे डॉ. कश्यप ने किशोरावस्था में ही राष्ट्रीय आंदोलनों में भाग लेना शुरू कर दिया था। छात्र जीवन में उन्होंने बिजनौर और मेरठ में ब्रिटिश शासन के विरुद्ध आंदोलनों का नेतृत्व किया। यही राष्ट्रीय चेतना आगे चलकर उन्हें लोकतांत्रिक संस्थाओं का आजीवन प्रहरी बना गई।

डॉ. कश्यप की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि उन्होंने संविधान को केवल न्यायालयों और विधि विशेषज्ञों तक सीमित नहीं रहने दिया। उनकी पुस्तकें—‘आवर कॉन्स्टिट्यूशन’, ‘आवर पार्लियामेंट’ और अन्य अनेक ग्रंथ—ने लाखों विद्यार्थियों और नागरिकों को संविधान की जटिलताओं को सरल भाषा में समझने का अवसर दिया। उन्होंने बार-बार कहा कि लोकतंत्र केवल चुनावों से नहीं चलता, बल्कि संविधान के प्रति नागरिकों की समझ और आस्था से मजबूत होता है।

उनकी विद्वत्ता को देखते हुए भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया। किंतु उनके व्यक्तित्व की सबसे बड़ी पहचान पुरस्कार नहीं, बल्कि वह विश्वास था जो देश की हर पीढ़ी ने उन पर किया। वे संविधान की भाषा को जनता की भाषा में अनुवादित करने वाले दुर्लभ विद्वान थे।

आज जब हम उन्हें विदाई दे रहे हैं, तब बिजनौर की धरती गर्व और शोक दोनों भावों से भरी हुई है। गर्व इस बात का कि इसी मिट्टी ने देश को डॉ. सुभाष कश्यप जैसा लोकतंत्र का प्रहरी दिया; और शोक इस बात का कि अब वह स्वर हमेशा के लिए मौन हो गया है, जो संविधान की गरिमा और संसद की प्रतिष्ठा का सबसे प्रामाणिक पक्षधर था।

डॉ. सुभाष कश्यप का शरीर भले ही पंचतत्व में विलीन हो गया हो, लेकिन उनके विचार, उनकी पुस्तकें और लोकतंत्र के प्रति उनकी निष्ठा आने वाली पीढ़ियों का मार्गदर्शन करती रहेंगी। भारतीय संसद के इतिहास में उनका नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित रहेगा, और बिजनौर की स्मृतियों में वे सदैव उस पुत्र के रूप में जीवित रहेंगे जिसने अपनी जन्मभूमि का नाम राष्ट्रीय चेतना के सर्वोच्च शिखरों तक पहुंचाया।