ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में टकराव, अमेरिका, रूस और चीन आमने-सामने…
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर अमेरिका, रूस और चीन आमने-सामने आ गए। अमेरिका ने एक प्रस्ताव रखा था जिसमें ईरान पर लगाए गए संयुक्त राष्ट्र प्रतिबंधों की निगरानी करने वाले विशेषज्ञों के पैनल का कार्यकाल एक साल और बढ़ाने की बात कही गई थी। इस प्रस्ताव को 11 देशों का समर्थन मिला, लेकिन रूस और चीन ने वीटो कर दिया। सोमालिया और पाकिस्तान ने मतदान से दूरी बनाई।
ईरान पर लागू प्रतिबंध
- संपत्ति फ्रीज: विदेशों में मौजूद ईरान की संपत्तियों को फ्रीज किया जा सकता है।
- हथियारों पर रोक: ईरान के साथ हथियारों की खरीद-बिक्री पर रोक है।
- बैलिस्टिक मिसाइल गतिविधियां: मिसाइल कार्यक्रम से जुड़ी गतिविधियों पर पाबंदी है।
- ये प्रतिबंध 2015 के परमाणु समझौते की ‘स्नैपबैक’ व्यवस्था के तहत 2025 में दोबारा लागू किए गए थे।
अमेरिका का तर्क
अमेरिका का कहना था कि विशेषज्ञों का पैनल प्रतिबंधों के उल्लंघन और ईरान के साथ प्रतिबंधित सहयोग पर नजर रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। अमेरिकी उप राजदूत जेनिफर लोसेटा ने कहा कि रूस और चीन के वीटो से निगरानी कमजोर होगी और ईरान को फायदा मिल सकता है।
रूस और चीन का रुख
रूस के राजदूत वासिली नेबेंजिया ने कहा कि ‘स्नैपबैक’ के जरिए प्रतिबंधों की वापसी ही गैरकानूनी थी। इसलिए विशेषज्ञों के पैनल का कार्यकाल बढ़ाने का अमेरिकी प्रस्ताव भी कानूनी आधार से रहित था। चीन ने भी इसी तर्क का समर्थन किया।
ईरान की प्रतिक्रिया
ईरान ने रूस और चीन को धन्यवाद दिया और कहा कि उन्होंने अमेरिका और उसके सहयोगियों की राजनीतिक कोशिशों को रोक दिया। वहीं, फ्रांस ने प्रतिबंधों को जरूरी बताया और कहा कि इससे ईरान को परमाणु समझौते का पालन करने के लिए दबाव बनाया जा सकता है।
परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंता
अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के अनुसार, ईरान के पास 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है जिसे 60% तक शुद्ध किया गया है। यह स्तर हथियार बनाने लायक 90% शुद्धता से तकनीकी तौर पर एक कदम नीचे माना जाता है। जून 2025 में इजरायल और अमेरिका के हमलों के बाद निरीक्षकों को ईरान के भंडार की स्थिति की पुष्टि करने में कठिनाई हुई थी।
पहले भी हुआ ऐसा
मार्च 2024 में रूस के वीटो के बाद उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम पर नजर रखने वाले UN विशेषज्ञों का काम बंद हो गया था। इसी तरह माली और यमन में भी प्रतिबंधों की निगरानी कमजोर हुई।
आगे की संभावनाएं
फ्रांस ने संकेत दिया है कि अमेरिका, ब्रिटेन और जर्मनी मिलकर एक नई निगरानी टीम बना सकते हैं। उत्तर कोरिया के मामले में भी विशेषज्ञों का पैनल खत्म होने के बाद वैकल्पिक निगरानी तंत्र अपनाया गया था।









