ब्रिक्स समिट 2026: मोदी-जिनपिंग मुलाकात में सहयोग और आपसी सम्मान पर जोर

भारत और चीन के बीच लंबे समय से चले आ रहे तनावपूर्ण रिश्तों में नई ऊर्जा देखने को मिली जब चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग सात साल बाद भारत पहुंचे और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाकात की। यह दौरा खास इसलिए भी रहा क्योंकि 2020 की गलवान घाटी झड़प के बाद यह जिनपिंग का पहला भारत दौरा है।

जिनपिंग का संदेश: साथ मिलकर काम करने की अपील

बैठक के दौरान राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने कहा कि मौजूदा अंतरराष्ट्रीय हालात बेहद जटिल हैं और ऐसे समय में दुनिया की दो सबसे बड़ी आबादी वाले देशों — भारत और चीन — की जिम्मेदारी और भी बढ़ जाती है। उन्होंने जोर दिया कि दोनों देशों को ग्लोबल साउथ के अहम सदस्य होने के नाते मानवता के भविष्य और अपने नागरिकों की भलाई को ध्यान में रखते हुए काम करना चाहिए।

जिनपिंग ने प्रस्ताव रखा कि भारत और चीन को ब्रिक्स ढांचे के भीतर उच्च-गुणवत्ता वाले सहयोग को आगे बढ़ाना चाहिए। उन्होंने बहुध्रुवीय दुनिया और समावेशी आर्थिक वैश्वीकरण की वकालत करते हुए कहा कि इससे विश्व शांति, स्थिरता और विकास को नई सकारात्मक ऊर्जा मिलेगी।

पीएम मोदी का जवाब: तीन ‘आपसी’ सिद्धांत

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बैठक में कहा कि भारत-चीन संबंधों को रणनीतिक और दीर्घकालिक दृष्टिकोण से देखना चाहिए। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि मतभेदों को विवाद में नहीं बदलना चाहिए। मोदी ने तीन ‘आपसी’ बातों पर जोर दिया:

  • आपसी सम्मान
  • आपसी संवेदनशीलता
  • आपसी हित

मोदी ने कहा कि यही तीन सिद्धांत दोनों देशों के रिश्तों की नींव मजबूत करेंगे।

व्यापारिक संबंध: तनाव के बावजूद बढ़ता आयात

दिलचस्प बात यह है कि गलवान झड़प के बाद भी भारत-चीन व्यापार में गिरावट नहीं आई। 2020-21 में चीन से भारत का आयात लगभग 65 अरब डॉलर था, जो 2025-26 में बढ़कर 132 अरब डॉलर से अधिक हो गया। यानी आयात लगभग दोगुना हो गया। यह दर्शाता है कि राजनीतिक तनाव के बावजूद आर्थिक रिश्ते मजबूत बने रहे।

दौरे का महत्व

  • शी जिनपिंग सात साल बाद भारत आए।
  • पालम एयरपोर्ट पर केंद्रीय मंत्री जितिन प्रसाद ने उनका स्वागत किया।
  • ब्रिक्स समिट में शामिल होने के बाद उन्होंने पीएम मोदी से द्विपक्षीय वार्ता की।
  • दोनों नेताओं ने अगस्त 2025 में तियानजिन में हुई पिछली मुलाकात के बाद से रिश्तों में हुई प्रगति का स्वागत किया।

    यह मुलाकात भारत-चीन रिश्तों में नई दिशा देने की कोशिश के रूप में देखी जा रही है। अब सवाल यह है कि क्या दोनों देश अपने मतभेदों को पीछे छोड़कर सहयोग की नई राह बना पाएंगे।