जब गुनाह इंसान करे और इल्ज़ाम गुलदार पर लगे…
बिजनौर में कई घटनाओं ने उठाया बड़ा सवाल,क्या जंगल के शिकारी से ज्यादा खतरनाक हो गया है इंसान?
मरगूब रहमानी
बिजनौर (चिंगारी)। अपना गुनाह किसी और के सिर मढ़ देना शायद इंसान की पुरानी फितरतों में से एक है। मगर जब सामने कोई बेजुबान हो, जो अपने ऊपर लगे इल्ज़ाम का जवाब तक न दे सके, तो यह फितरत और भी भयावह हो जाती है। बिजनौर के जंगलों में गुलदार और इंसान के बीच संघर्ष कोई नई बात नहीं। आए दिन गुलदार के हमले की खबरें सामने आती हैं। गांवों में दहशत फैलती है। लोग अपने घरों से निकलने में डरते हैं। खेतों में जाने से पहले कई बार सोचते हैं। लेकिन पिछले कुछ वर्षों में सामने आईं कुछ घटनाओं ने इस डर के पीछे छिपे एक और भयावह सच को उजागर किया है। कुछ मामलों में इंसान ने अपने ही हाथों से खून बहाया और उस खून के छींटे बेज़ुबान जानवर पर डालने की कोशिश की, जो बोल नहीं सकता। गुलदार के पंजों के निशान तलाशे गए, मगर जांच आगे बढ़ी तो इंसानी हाथों के निशान सामने आ गए।
इसी माह हीमपुर दीपा थाना क्षेत्र के ग्राम अजूपुरा जट में सामने आई घटना ने तो रिश्तों की बुनियाद तक हिला दी। पुलिस के मुताबिक, महज पांच लाख रुपये के लालच में एक बेटे ने अपनी ही मां की हत्या कर दी और कथित तौर पर अपने अपराध पर पर्दा डालने के लिए हत्या का इल्ज़ाम गुलदार के सिर मढऩे की कोशिश की।
जिस मां ने जन्म दिया… उंगली पकडक़र चलना सिखाया… अपनी ममता से जिंदगी संवारी… उसी मां की मौत के बाद उसके बेटे ने कथित तौर पर उसे इंसानी नहीं, बल्कि गुलदार के हमले का रूप देने की कोशिश की। मगर सच ज्यादा देर तक छिप नहीं सका। इंसान का गुनाह, गुलदार के नाम लिखने की कोशिश नाकाम हो गई।
बिजनौर में यह पहली ऐसी घटना नहीं थी। नांगल थाना क्षेत्र के ग्राम तिसोतरा में भी सुनाई गई थी ‘गुलदार’ की ऐसी ही कहानी। गत वर्ष 15 नवंबर को तिसोतरा में एक सनसनीखेज घटना सामने आई थी। पुलिस के मुताबिक, सुभाष तोमर का अपनी पुत्रवधू को लेकर अपने बेटे सौरभ से विवाद चल रहा था। आरोप है कि वह अपने बेटे को जंगल की ओर ले गया। वहां तमंचे से गोली चलाई गई, लेकिन गोली निशाने पर नहीं लगी। इसके बाद कथित तौर पर फावड़े से सिर पर वार कर सौरभ की हत्या कर दी गई।
अपने गुनाह को छिपाने के लिए कथित पापी पिता ने कहानी गढ़ी — गुलदार ने अचानक हमला किया और जान ले ली लेकिन पोस्टमार्टम ने कहानी का रुख बदल दिया। जिस मौत को गुलदार के खाते में डालने की कोशिश की जा रही थी, उसके पीछे इंसान का हाथ सामने आया। जांच आगे बढ़ी और पुलिस ने आरोपी पिता को गिरफ्तार कर जेल भेज दिया। एक बार फिर जंगल का जानवर कटघरे में खड़ा था… और असली शिकारी इंसानी बस्ती में छिपा हुआ था। संसारपुर में भी क़ातिलों ने गुलदार के पीछे छिपने की कोशिश की थी। गत वर्ष 16 मई को चांदपुर थाना क्षेत्र के ग्राम संसारपुर में खेत की मेंढ को लेकर विवाद हुआ। विवाद इतना बढ़ा कि कमलजीत सिंह की धारदार हथियारों से हत्या कर दी गई। हत्या के बाद कथित हत्यारोपियों ने अपने अपराध पर पर्दा डालने के लिए गांव में यह बात फैलाने की कोशिश की कि ‘गुलदार ने मार डाला।’ एक बार फिर एक बेजुबान जानवर को इंसानी खून का जिम्मेदार बनाने की कोशिश हुई,लेकिन इस बार भी सच ने दम नहीं तोड़ा। पोस्टमार्टम ने कहानी पर सवाल खड़े किए। जांच शुरू हुई। तफ्तीश आगे बढ़ी। कडिय़ां जुड़ती गईं और आखिरकार आरोपी पुलिस की गिरफ्त में पहुंच गए। गुलदार फिर निर्दोष निकला और इंसान का चेहरा बेनकाब हो गया।
जब एक महिला के गायब होने पर भी गुलदार को बना दिया गया जिम्मेदार
पिछले वर्ष 10 नवंबर को किरतपुर क्षेत्र के ग्राम शाहपुर सुक्खा से एक महिला के गायब होने की खबर ने भी इलाके में सनसनी फैला दी थी। अफवाह उड़ गई कि गुलदार महिला को उठा ले गया। लोगों के बीच भय का माहौल बन गया। जंगल की ओर शक की निगाहें उठने लगीं। लेकिन कुछ समय बाद कहानी ने ऐसा मोड़ लिया, जिसने एक बार फिर सवाल खड़ा कर दिया कि हर अनहोनी का पहला आरोपी गुलदार ही क्यों? महिला जब देहरादून से सकुशल बरामद हो गई तो गुलदार पर लगा एक और इल्ज़ाम हवा हो गया। लेकिन उन घटनाओं का क्या, जिनमें पोस्टमार्टम हुआ ही नहीं? इन घटनाओं में जहां पोस्टमार्टम और पुलिस जांच ने सच को सामने लाने में मदद की, वहीं एक सवाल अब भी अपनी जगह खड़ा है। उन घटनाओं का क्या, जिनमें लाश बरामद ही नहीं हुई? उन घटनाओं का क्या, जिनमें पोस्टमार्टम नहीं कराया गया? उन मौतों का क्या, जिनकी कहानी जंगल और गुलदार के नाम लिखकर हमेशा के लिए बंद कर दी गई? क्या हर अनहोनी का दोष गुलदार के सिर मढ़ देना सबसे आसान रास्ता है? बिजनौर जंगलों से घिरा जिला है। यहां गुलदार और इंसान का संघर्ष वास्तविक है। गुलदार के हमलों का दर्द भी वास्तविक है। कई परिवारों ने अपनों को खोया है और कई गांवों ने डर के साये में रातें काटी हैं। लेकिन इसी वास्तविक भय की आड़ में यदि कोई इंसान अपने अपराध को छिपाने की कोशिश करता है, तो यह सिर्फ कानून के साथ धोखा नहीं, बल्कि उस हर परिवार के दर्द के साथ भी छल है, जिसने सचमुच गुलदार के हमले में कोई अपना खोया है।
जंगल का गुलदार भूख से शिकार करता है,लेकिन इंसान? वह कभी लालच में मारता है। कभी रंजिश में। कभी जमीन-जायदाद के लिए। कभी बदले की आग में। और कभी अपने ही रिश्तों की कीमत लगा देता है। फिर अपने गुनाह का चेहरा छिपाने के लिए सामने कर देता है उस बेजुबान गुलदार को… जो अपने ऊपर लगे इल्ज़ाम का जवाब नहीं दे सकता। गुलदार से तो शायद इंसान बचने का रास्ता खोज सकता है। जंगल से बचकर निकल सकता है। झुंड बनाकर चल सकता है। सावधानी बरत सकता है। लेकिन जब इंसान ही इंसान का शिकारी बन जाए, जब खून करने वाला ही कहानी लिखने लगे, और जब उस कहानी में असली अपराधी की जगह जंगल के एक बेजुबान जीव को खड़ा कर दिया जाए— तब इंसानियत किससे बचेगी? सवाल सिर्फ इतना नहीं कि जंगल में कितने गुलदार हैं।
बड़ा सवाल यह है कि… हमारे बीच कितने ऐसे चेहरे हैं, जो इंसान दिखते हैं, मगर मौका मिलते ही इंसानियत का शिकार कर डालते हैं? और शायद इससे भी बड़ा सवाल यह है कि क्या हर बार गुलदार को कटघरे में खड़ा करने से पहले हम यह देखना भूल गए हैं कि कहीं असली शिकारी हमारे आसपास, हमारे बीच और कभी-कभी हमारे अपने घर में तो नहीं?









