बिजनौर से होगी यूपी में गुलदारों के बधियाकरण की शुरुआत, मानव-वन्यजीव संघर्ष रोकने के लिए तैयार हुआ बड़ा प्लान
पांच साल के चरणबद्ध कार्यक्रम की तैयारी, वन्यजीव अस्पताल से लेकर फेंसिंग और कैमरा निगरानी तक होंगे कई इंतजाम
बिजनौर। उत्तर प्रदेश में बढ़ते मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करने के लिए वन विभाग ने एक नई रणनीति तैयार की है। इसके तहत प्रदेश में पहली बार तेंदुओं यानी गुलदारों के बधियाकरण की योजना बनाई गई है। पायलट प्रोजेक्ट के रूप में इसकी शुरुआत बिजनौर से किए जाने की तैयारी है। योजना को लागू करने के लिए सरकार से आवश्यक अनुमति लेने की प्रक्रिया शुरू की जा रही है।
वन विभाग के प्रस्ताव के मुताबिक, बिजनौर को इस परियोजना के लिए इसलिए चुना गया है क्योंकि यहां गन्ने के खेतों और वन क्षेत्रों के आसपास गुलदारों की मौजूदगी लंबे समय से दर्ज की जाती रही है। खेतों में घनी वनस्पति गुलदारों को छिपने और विचरण के लिए उपयुक्त वातावरण उपलब्ध कराती है, जिससे कई बार उनका सामना ग्रामीणों और किसानों से हो जाता है।
बिजनौर में करीब 444 गुलदार होने का अनुमान
वन विभाग की रिपोर्ट के अनुसार, वर्तमान में बिजनौर जिले में करीब 444 गुलदार होने का अनुमान है। विभागीय आकलन में यह आशंका जताई गई है कि यदि आबादी बढ़ने की मौजूदा प्रवृत्ति जारी रही तो अगले पांच वर्षों में इनकी संख्या करीब 1,336 तक पहुंच सकती है। प्रस्तावित बधियाकरण कार्यक्रम के माध्यम से इस वृद्धि को सीमित रखने का लक्ष्य रखा गया है। रिपोर्ट में अनुमान है कि हस्तक्षेप के बाद संख्या को लगभग 755 के स्तर तक सीमित रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि, ये आंकड़े विभागीय अनुमान और प्रस्ताव का हिस्सा हैं। वास्तविक संख्या और आबादी की स्थिति का वैज्ञानिक आकलन अलग प्रक्रिया से किया जा रहा है। वर्ष 2026 में भारतीय वन्यजीव संस्थान की टीम ने भी बिजनौर में गुलदारों की मौजूदगी और संख्या का आकलन करने के लिए सर्वे शुरू किया था, जिसमें कैमरा ट्रैप समेत अन्य तकनीकों का इस्तेमाल किया गया।
पांच साल में 75 प्रतिशत गुलदारों के बधियाकरण की योजना
प्रस्तावित योजना के अनुसार, अगले पांच वर्षों में प्रभावित क्षेत्रों में गुलदारों की आबादी के करीब 75 प्रतिशत हिस्से को बधियाकरण कार्यक्रम के दायरे में लाने का लक्ष्य रखा गया है। इसे एक साथ लागू करने के बजाय चरणबद्ध तरीके से आगे बढ़ाने की योजना है।
इस प्रक्रिया में पहले हॉटस्पॉट क्षेत्रों की पहचान की जाएगी। कैमरा ट्रैप और अन्य निगरानी तकनीकों के माध्यम से गुलदारों की गतिविधियों और मौजूदगी का पता लगाया जाएगा। इसके बाद चिन्हित जानवरों को विशेषज्ञों की निगरानी में सुरक्षित तरीके से रेस्क्यू किया जाएगा।
बधियाकरण के बाद गुलदारों को निगरानी और उपचार के लिए पोस्ट-ऑपरेटिव सुविधा में रखा जाएगा। पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद उन्हें निर्धारित वन क्षेत्र में वापस छोड़े जाने की योजना है।
2.73 करोड़ रुपये से बनेगा वन्यजीव अस्पताल
योजना का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बिजनौर में समर्पित वन्यजीव चिकित्सा सुविधा स्थापित करना है। इसके लिए करीब 2.73 करोड़ रुपये खर्च किए जाने का प्रस्ताव है।
प्रस्तावित वन्यजीव अस्पताल में ऑपरेशन थिएटर, सर्जिकल उपकरण, आधुनिक एनेस्थीसिया मशीन, मल्टीपैरामीटर मॉनिटर और प्री एवं पोस्ट-ऑपरेटिव वार्ड जैसी सुविधाएं विकसित की जाएंगी। यहां वन्यजीव चिकित्सकों के साथ रिसर्च असिस्टेंट, पशु चिकित्सा फार्मासिस्ट और प्रशिक्षित एनिमल हैंडलर्स की तैनाती की योजना है।
310 किलोमीटर लंबी फेंसिंग और थर्मल कैमरों की भी योजना
गुलदारों को आबादी वाले क्षेत्रों में पहुंचने से रोकने के लिए केवल बधियाकरण पर निर्भर नहीं रहने की योजना है। प्रस्ताव में करीब 310 किलोमीटर लंबी चेन-लिंक फेंसिंग का निर्माण भी शामिल है।
फेंसिंग और संवेदनशील इलाकों में थर्मल नाइट विजन कैमरे लगाए जाने की योजना है। इन कैमरों से मिलने वाली जानकारी को कमांड सेंटर से मॉनिटर करने का प्रस्ताव है। इससे वन विभाग को गुलदारों की आवाजाही पर नजर रखने और संवेदनशील क्षेत्रों में समय रहते कार्रवाई करने में मदद मिल सकती है।
कई जिलों में बढ़ी गुलदारों की मौजूदगी
बिजनौर के अलावा मुरादाबाद, बरेली, पीलीभीत, लखीमपुर खीरी, बहराइच और श्रावस्ती समेत उत्तर प्रदेश के कई जिलों में गुलदारों की मौजूदगी मानव बस्तियों के आसपास देखी जा रही है। रुहेलखंड क्षेत्र में भी गुलदारों की बड़ी आबादी होने की बात विभागीय रिपोर्टों में सामने आई है।
बिजनौर में मानव-गुलदार संघर्ष का मुद्दा पहले भी प्रशासन और वन विभाग के लिए चुनौती रहा है। जिले में जंगलों के साथ-साथ गन्ने के खेत गुलदारों के लिए छिपने और आवास का काम करते हैं। इसी कारण कई ग्रामीण क्षेत्रों में गुलदारों की आवाजाही की घटनाएं सामने आती रहती हैं। मानव-गुलदार संघर्ष को लेकर उत्तर प्रदेश राज्य आपदा प्रबंधन प्राधिकरण की एक केस स्टडी में भी बिजनौर को प्रमुख प्रभावित क्षेत्रों में शामिल किया गया है।
महाराष्ट्र के बाद यूपी में पहली ऐसी पहल
उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, महाराष्ट्र के जुन्नार क्षेत्र में इस तरह की पहल के बाद उत्तर प्रदेश में पहली बार गुलदारों के बधियाकरण को लेकर योजना तैयार की गई है। यूपी में इसे अभी पायलट प्रोजेक्ट के तौर पर प्रस्तावित किया गया है। परियोजना के परिणामों के आधार पर आगे इसे अन्य प्रभावित क्षेत्रों तक बढ़ाने पर विचार किया जा सकता है।
वन्यजीव संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन चुनौती
गुलदारों की संख्या नियंत्रित करने के लिए बधियाकरण की योजना के साथ वन्यजीव संरक्षण से जुड़े वैज्ञानिक और नैतिक पहलुओं पर भी चर्चा जरूरी है। हाल ही में प्रकाशित एक वैज्ञानिक टिप्पणी में तेंदुओं के स्टेरिलाइजेशन से जुड़े पारिस्थितिक और नैतिक प्रभावों पर सवाल उठाए गए हैं और मानव-वन्यजीव सह-अस्तित्व आधारित उपायों पर भी ध्यान देने की बात कही गई है।
इसलिए प्रस्तावित परियोजना में केवल आबादी नियंत्रण ही नहीं, बल्कि गुलदारों की सुरक्षित निगरानी, उचित रेस्क्यू, उपचार, पुनर्वास, ग्रामीणों में जागरूकता और वन क्षेत्रों की सुरक्षा जैसे पहलुओं की भूमिका भी महत्वपूर्ण होगी।
क्या है इस योजना का मुख्य उद्देश्य?
- गुलदारों की बढ़ती आबादी की वृद्धि दर को नियंत्रित करना।
- मानव और गुलदार के बीच होने वाले संघर्ष को कम करना।
- संवेदनशील क्षेत्रों में गुलदारों की गतिविधियों की लगातार निगरानी करना।
- घायल या रेस्क्यू किए गए वन्यजीवों के लिए बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराना।
- जंगल और आबादी के बीच सुरक्षित सीमा विकसित करना।
- वैज्ञानिक निगरानी के आधार पर भविष्य की वन्यजीव प्रबंधन नीति तैयार करना।
वन विभाग के अनुसार, बिजनौर से शुरू होने वाला यह पायलट प्रोजेक्ट सफल रहता है तो इसके अनुभवों के आधार पर प्रदेश के अन्य मानव-गुलदार संघर्ष प्रभावित क्षेत्रों के लिए भी विस्तृत रणनीति तैयार की जा सकती है। इस तरह यह परियोजना केवल गुलदारों की संख्या नियंत्रित करने तक सीमित नहीं होगी, बल्कि मानव सुरक्षा और वन्यजीव संरक्षण के बीच संतुलन बनाने की व्यापक कोशिश के रूप में देखी जा रही है।










