दहेज की भेंट चढ़े दुल्हन बनी लड़की के अरमान, निकाह से पहले ही लौट गई बारात

रिक्शा चालक पिता की वर्षों की मेहनत, बेटी के हाथों की मेहंदी और घर की उम्मीदें पल भर में बिखर गईं


दहेज कम होने की चर्चा के बीच दूल्हा भी हुआ गायब

बिजनौर (चिंगारी)
महंगाई और दहेज जैसी सामाजिक बुराइयों के बीच गरीब परिवारों की बेटियों के सपने किस तरह टूटते हैं, इसका दर्दनाक दृश्य बुधवार को बिजनौर शहर में देखने को मिला। एक रिक्शा चालक पिता, जिसने अपनी बेटी की शादी के लिए वर्षों तक पसीना बहाया, अपनी सामर्थ्य से बढ़कर इंतजाम किए, लेकिन जब दहेज की कसौटी पर उसकी गरीबी तौली गई तो खुशियों से सजा विवाह मंडप कुछ ही घंटों में मातम में बदल गया।


स्थानीय मोहल्ला मिर्दगान खस्सा कॉलोनी निवासी राईन बिरादरी के एक गरीब रिक्शा चालक की बेटी का निकाह कैराना निवासी तुफैल से तय हुआ था। परिवार में कई दिनों से उत्सव का माहौल था। घर की दीवारें सजाई गई थीं, रिश्तेदारों का आना-जाना लगा था और बेटी की आंखों में एक नए जीवन के अनगिनत सपने पल रहे थे।


बताया जाता है कि चांदपुर मार्ग स्थित चांदनी मैरिज हॉल में बारात पूरे ठाठ-बाट से पहुंची। लड़की पक्ष ने अपनी आर्थिक स्थिति कमज़ोर होने के बावजूद बारातियों के स्वागत में कोई कमी नहीं छोड़ी। बारातियों को नाश्ता कराया गया, फिर सम्मान के साथ भोजन परोसा गया। रिक्शा चालक पिता बार-बार हाथ जोड़कर मेहमानों की खिदमत में लगा रहा। शायद उसे यही भरोसा था कि उसकी बेटी की खुशियों के आगे उसकी गरीबी कभी आड़े नहीं आएगी।
लेकिन खुशियों के पल अचानक करवट लेने लगे।


निकाह की तैयारियों के बीच बारात में शामिल कुछ महिलाओं ने दहेज का सामान देखने की इच्छा जताई। जब उन्हें पता चला कि गरीब पिता मोटरसाइकिल और महंगे घरेलू सामान का इंतजाम नहीं कर पाया है, तो माहौल बदलने लगा। धीरे-धीरे कुछ महिलाएं बहाना बनाकर विवाह स्थल से निकल गईं। फिर एक-एक कर अन्य बाराती भी वहां से खिसकने लगे।


उधर लड़की पक्ष को लगा कि शायद मेहमान किसी जरूरी काम से बाहर गए हैं। वे निकाह की तैयारियों में व्यस्त रहे। लेकिन कुछ देर बाद जब दूल्हा भी लघुशंका का बहाना बनाकर विवाह स्थल से बाहर गया और फिर वापस नहीं लौटा, तब बेचैनी बढ़ने लगी।


बताया जाता है कि जब हकीकत सामने आई और यह पता चला कि बारात लौट चुकी है, तो विवाह स्थल पर सन्नाटा छा गया। अभी कुछ देर पहले तक जहां खुशियों की गूंज थी, वहां अब सिसकियों की आवाजें सुनाई देने लगीं।
प्रत्यक्षदर्शियों के अनुसार, दुल्हन यह खबर सुनते ही फूट-फूट कर रो पड़ी। उसके हाथों की ताजा मेहंदी, आंखों में सजा काजल और भविष्य के सपने एक ही पल में बिखर गए। वह बार-बार यही पूछती रही कि आखिर उसका कसूर क्या था?
वहीं, रिक्शा चालक पिता की हालत भी देखकर लोगों की आंखें नम हो गईं।

जिसने दिन-रात रिक्शा चलाकर बेटी की शादी के लिए पैसे जोड़े थे, वह बेबस होकर सिर पकड़कर बैठ गया। बताया जाता है कि वह अपनी बेटी को ढांढस बंधाने की कोशिश करता रहा, लेकिन उसके अपने आंसू भी रुकने का नाम नहीं ले रहे थे।

मैरिज हॉल में मौजूद लोगो की आंखें भर आईं

लोगों के बीच एक ही सवाल गूंजता रहा—क्या आज भी किसी बेटी की किस्मत का फैसला उसके संस्कारों और चरित्र से नहीं, बल्कि दहेज के सामान से किया जाएगा?


यह घटना केवल एक परिवार का दर्द नहीं, बल्कि समाज के सामने खड़ा एक ऐसा सवाल है जो हर संवेदनशील इंसान को झकझोर देता है। एक गरीब पिता की टूटी उम्मीदें और एक दुल्हन के बिखरे सपने चारों ओर पसरी खामोशी में शायद यही पुकार रहे हैं—”क्या बेटियां अब भी दहेज से छोटी हैं?”।