मेरठ नीला ड्रम हत्याकांड: हत्या के दोषी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड, फैसले के बाद पेन डस्टबिन में डाला
मौत की सजा सुनाने से पहले जज ने महाभारत का किया जिक्र
मेरठ, उत्तर प्रदेश। मेरठ के चर्चित नीला ड्रम हत्याकांड में सौरभ राजपूत की हत्या के दोषी मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को मृत्युदंड सुनाए जाने के बाद जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा भी चर्चा में हैं। सजा सुनाने से पहले अदालत में महाभारत का संदर्भ देकर न्याय और दंड के महत्व को समझाने तथा फैसला सुनाने के बाद इस्तेमाल किए गए पेन को डस्टबिन में डालने की घटना को लेकर लोगों का ध्यान उनकी ओर गया है।
यह मामला केवल अपराध की गंभीरता और अदालत के फैसले के कारण ही सुर्खियों में नहीं है, बल्कि सजा सुनाने के दौरान न्यायाधीश की टिप्पणियों और उनके व्यवहार को लेकर भी चर्चा में है। हालांकि, पेन को डस्टबिन में डालने के पीछे न्यायाधीश की ओर से कोई आधिकारिक वजह सामने नहीं आई है।
13 महीने की सुनवाई के बाद सुनाया गया फैसला
सौरभ राजपूत हत्याकांड में करीब 13 महीने तक कानूनी कार्यवाही चली। इस दौरान अदालत में 126 तारीखों पर सुनवाई हुई। सुनवाई पूरी होने के बाद अदालत ने मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को हत्या का दोषी ठहराया। इसके बाद दोनों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।
इस फैसले को मेरठ के न्यायिक इतिहास के लिहाज से भी महत्वपूर्ण बताया जा रहा है। उपलब्ध विवरण के अनुसार, शहर में इससे पहले वर्ष 2003 में एक डॉक्टर को मृत्युदंड सुनाया गया था। इसके करीब 23 साल बाद इस मामले में दो दोषियों को मौत की सजा सुनाए जाने से यह फैसला चर्चा में आ गया है।
सजा सुनाने से पहले महाभारत का उल्लेख
फैसले के दौरान जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा ने महाभारत का संदर्भ देते हुए न्याय, कर्तव्य और दंड की भूमिका पर अपनी बात रखी। उनकी टिप्पणियों का मुख्य भाव यह था कि अपराध की प्रकृति और गंभीरता के अनुरूप दंड देना न्यायिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण दायित्व है।
उन्होंने कानून और समाज के संबंध को समझाने के लिए बाघ और जंगल का उदाहरण भी दिया। इस उदाहरण के जरिए उन्होंने बताया कि जिस प्रकार जंगल का अस्तित्व बाघ के जीवन से जुड़ा है, उसी तरह कानून और समाज का संबंध भी एक-दूसरे से जुड़ा हुआ है।
कानून का उद्देश्य केवल अपराध होने के बाद दंड देना नहीं, बल्कि लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करना और समाज में व्यवस्था बनाए रखना भी है। अदालत में दिए गए इस संदेश को अपराध और उसके परिणामों के संदर्भ में देखा जा रहा है।
मृत्युदंड का आदेश लिखने के बाद पेन डस्टबिन में डाला
अदालत में सजा सुनाए जाने के बाद न्यायाधीश की एक अन्य गतिविधि भी चर्चा का विषय बन गई। बताया गया कि मृत्युदंड का आदेश सुनाने के लिए इस्तेमाल किए गए पेन को उन्होंने बाद में डस्टबिन में डाल दिया।
इस घटना ने इसलिए भी लोगों का ध्यान खींचा, क्योंकि पेन का इस्तेमाल दो दोषियों को मृत्युदंड सुनाने से संबंधित आदेश में हुआ था। हालांकि, न्यायाधीश ने ऐसा क्यों किया, इस बारे में कोई आधिकारिक स्पष्टीकरण सामने नहीं आया है।
इसलिए पेन को डस्टबिन में डालने की घटना के पीछे किसी विशेष भावना, प्रतीकात्मक संदेश या व्यक्तिगत मंशा का दावा करना उचित नहीं होगा। फिलहाल, यह घटना फैसले से जुड़ी चर्चाओं का एक हिस्सा बनी हुई है।
पांच महीने पहले ही मेरठ में संभाला था पदभार
जिला जज अरविंद कुमार मिश्रा को मेरठ में पदभार संभाले लगभग पांच महीने हुए थे, जब इस चर्चित हत्याकांड में फैसला सुनाया गया। मामले में उन्होंने 30 सितंबर को मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला को दोषी ठहराया था। इसके करीब दो सप्ताह बाद दोनों को मृत्युदंड की सजा सुनाई गई।
कम समय में इस बहुचर्चित मामले की सुनवाई और फैसला होने के बाद न्यायाधीश का नाम भी सुर्खियों में आ गया है। हालांकि, मामले की चर्चा का प्रमुख कारण अपराध की गंभीरता, अदालत का निर्णय और फैसले के दौरान की गई टिप्पणियां हैं।
क्या है मेरठ का नीला ड्रम हत्याकांड?
यह मामला सौरभ राजपूत की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के मामले के अनुसार, मुस्कान रस्तोगी और साहिल शुक्ला ने सौरभ की हत्या की और उसके शव के टुकड़े करके उन्हें नीले ड्रम में छिपाया। घटना सामने आने के बाद इसने देशभर में व्यापक ध्यान आकर्षित किया था।
मामले की जांच और सुनवाई के बाद अदालत ने दोनों आरोपियों को दोषी करार देते हुए मृत्युदंड सुनाया। इस फैसले के साथ एक बार फिर यह मामला चर्चा में आ गया है।










