भारत ने ताजिकिस्तान स्थित अयनी एयरबेस खाली किया: रक्षा नीति में रणनीतिक बदलाव के संकेत
भारत ने ताजिकिस्तान की राजधानी दुशांबे से लगभग 15 किलोमीटर दूर स्थित अयनी एयरबेस को खाली कर दिया है, जिससे लगभग 25 वर्षों की सैन्य मौजूदगी का समापन हुआ। यह एयरबेस सामरिक दृष्टि से भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण था, विशेष रूप से अफगानिस्तान, पाकिस्तान और चीन की गतिविधियों पर नजर रखने के लिहाज से।
अयनी एयरबेस: सामरिक महत्व और ऐतिहासिक पृष्ठभूमि
अयनी एयरबेस का निर्माण सोवियत संघ के दौर में हुआ था। 1991 में सोवियत विघटन के बाद यह ताजिकिस्तान सरकार के नियंत्रण में आ गया। वर्ष 2002 में भारत और ताजिकिस्तान के बीच हुए रणनीतिक समझौते के तहत भारत ने इस बेस के पुनर्निर्माण और आधुनिकीकरण का कार्य संभाला। भारतीय वायुसेना ने यहां MiG-29 लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, हैंगर और रनवे सिस्टम को उन्नत किया, जिससे मध्य एशिया में भारत की सैन्य उपस्थिति मजबूत हुई।
सामरिक लाभ और क्षेत्रीय प्रभाव
यह एयरबेस अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा से मात्र 100 किलोमीटर की दूरी पर स्थित था, जिससे भारत को क्षेत्रीय निगरानी में सुविधा मिलती थी। साथ ही, पाकिस्तान और चीन के शिंजियांग प्रांत की सीमाओं के निकट होने के कारण यह बेस भारत के लिए रणनीतिक दृष्टि से एक अहम केंद्र था।
बदलती प्राथमिकताएं और नई रणनीति
हाल के वर्षों में ताजिकिस्तान सरकार ने विदेशी सैन्य मौजूदगी पर सख्ती बढ़ाई है। राष्ट्रपति इमामोली रहमान की नीति के अनुसार देश में किसी भी विदेशी सेना की दीर्घकालिक तैनाती को सीमित किया गया है। दूसरी ओर, भारत अब अपनी रक्षा नीति में इंडो-पैसिफिक क्षेत्र को प्राथमिकता दे रहा है। अमेरिका, जापान और ऑस्ट्रेलिया के साथ क्वाड गठबंधन के तहत भारत समुद्री सुरक्षा और तकनीकी सहयोग को अधिक महत्व दे रहा है।
संतुलित दृष्टिकोण और भविष्य की दिशा
हालांकि अयनी एयरबेस से हटना प्रतीकात्मक रूप से मध्य एशिया में भारत की पकड़ को कमजोर दिखा सकता है, लेकिन यह कदम भारत की दीर्घकालिक और संतुलित रणनीति का हिस्सा है। भारत अब स्थायी सैन्य ठिकानों की बजाय कूटनीतिक, तकनीकी और समुद्री शक्ति के माध्यम से अपने हितों की रक्षा कर रहा है। चाबहार बंदरगाह (ईरान) और उत्तर-दक्षिण परिवहन गलियारे जैसे प्रोजेक्ट्स भारत की मध्य एशिया तक पहुंच बनाए रखने में सहायक हैं।
यह बदलाव भारत की विदेश और रक्षा नीति में एक नए युग की शुरुआत का संकेत देता है, जिसमें प्रत्यक्ष टकराव से बचते हुए वैश्विक साझेदारियों और प्रभाव क्षेत्रों को नए ढंग से परिभाषित किया जा रहा है।






