“चिंगारी”—बिजनौर की पत्रकारिता का अमर प्रकाश – राहुल नील
26 जनवरी 1950—भारत के इतिहास का वह स्वर्णिम दिन, जब इस महान राष्ट्र ने अपने लोकतांत्रिक सफर की औपचारिक शुरुआत की। यही वह क्षण था जब भारत ने विश्व मंच पर यह घोषणा की कि अब यह देश अपने संविधान और अपने नागरिकों की इच्छा से संचालित होगा। भारत एक गणराज्य बना, और आज़ादी के अमृत में भीगे उस दिन देश के हर कोने में नई चेतना, नई उम्मीद और नए संकल्पों की लहर उठी। उसी ऐतिहासिक क्षण में, उत्तर प्रदेश के बिजनौर जनपद में भी एक ‘चिंगारी’ फूटी—एक ऐसी पत्रकारिता की चिंगारी, जिसने न केवल स्याही और कागज़ के माध्यम से, बल्कि विचार और सत्य के प्रकाश से समाज को रोशन किया।
एक ऐसा अख़बार, जो आज़ादी के बाद से बिजनौर की हर धड़कन का गवाह बना है — जिसने इस ज़िले के सामाजिक, राजनीतिक, सांस्कृतिक और आर्थिक उतार-चढ़ाव को अपने पन्नों में सहेजा है। यह केवल एक समाचार-पत्र नहीं, बल्कि समय का सच बोलता हुआ वह आईना है जिसमें बिजनौर के जनजीवन की तस्वीर झलकती है। इसने उस किसान की पीड़ा को भी स्वर दिया है जो खेतों में पसीना बहाता है, और उस नौजवान की उम्मीदों को भी दिशा दी है जो परिवर्तन का सपना देखता है।
हर शाम जब इसकी स्याही से सनी सुर्खियाँ पाठकों के घरों तक पहुँचती हैं, तो वे केवल ख़बरें नहीं लातीं — वे एक जागरूक समाज का दस्तावेज़ होती हैं। इस अख़बार ने सत्ताओं के बदलते मिज़ाज देखे हैं, आंदोलनों की आहटें सुनी हैं, और विकास के हर छोटे-बड़े प्रयासों को दर्ज किया है। बिजनौर की गलियों से लेकर ग्राम्य परिवेश तक, यह हर आवाज़ का साथी बना रहा है।
आज जब सूचना की गति तेज़ हो चुकी है, तब भी इस अख़बार की विश्वसनीयता वही है — जो जनसरोकारों की धड़कनों से जुड़ी हुई है। यह केवल अतीत का रक्षक नहीं, बल्कि वर्तमान का साक्षी और भविष्य का मार्गदर्शक भी है। इसकी हर पंक्ति, हर शीर्षक और हर संपादकीय इस बात की गवाही देते हैं कि शब्द यदि सच्चे हों, तो वे समय को भी चुनौती दे सकते हैं।
यह ‘चिंगारी’ थी एक साप्ताहिक समाचार पत्र—“चिंगारी”, जिसने उस युग में जन्म लिया जब न सूचना तकनीक थी, न संचार के आधुनिक साधन। लेकिन एक कलम थी, एक संकल्प था, और था सच्चाई को जन-जन तक पहुंचाने का जज़्बा। इस अखबार के संस्थापक थे प्रख्यात पत्रकार बाबू सिंह चौहान—एक ऐसा नाम जिसने न सिर्फ बिजनौर बल्कि समूचे पश्चिमी उत्तर प्रदेश की पत्रकारिता को नई दिशा दी। उन्होंने केवल एक अखबार नहीं शुरू किया, बल्कि एक विचारधारा, एक आंदोलन और एक सामाजिक क्रांति की नींव रखी, जो आज भी अपनी लौ में उतनी ही प्रखरता लिए हुए है।
1950 का भारत गांवों और कस्बों में बसा हुआ था। आज़ादी के बाद देश लोकतंत्र के पहले चरण में प्रवेश कर रहा था, लेकिन ग्रामीण भारत अब भी अभाव, असमानता और अज्ञान की जकड़ में था। संचार के साधन सीमित थे, रेडियो और टेलीफोन भी बड़े शहरों की सीमा तक ही सिमटे थे। ऐसे में किसी जिले या कस्बे से प्रकाशित समाचार पत्र का निकलना स्वयं में एक साहसिक कार्य था। लेकिन बाबू सिंह चौहान के भीतर यह दृढ़ विश्वास था कि अगर लोकतंत्र को मजबूत बनाना है, तो जनता को सशक्त और जागरूक करना अनिवार्य है—और यही कार्य पत्रकारिता के माध्यम से किया जा सकता है।
‘चिंगारी’ का उदय उसी विचार से हुआ—एक ऐसी कलम के रूप में जो झुकती नहीं थी, डरती नहीं थी, और सच के लिए लड़ने का साहस रखती थी। चौहान जी का उद्देश्य केवल समाचार प्रकाशित करना नहीं था, बल्कि जनचेतना जगाना, अन्याय के विरुद्ध आवाज़ उठाना और लोकतंत्र की आत्मा को शब्द देना था। उनके लेखों में गाँव की धड़कन थी, किसान की पीड़ा थी, और आम आदमी की उम्मीद थी। यही कारण था कि ‘चिंगारी’ अपने आरंभिक वर्षों में ही जनता के दिलों की आवाज़ बन गई।
‘चिंगारी’ ने शुरुआत से ही यह सिद्ध कर दिया कि वह केवल सूचना देने वाला माध्यम नहीं, बल्कि जनता का प्रहरी, समाज का दर्पण और बदलाव की आवाज़ बनेगा। उसने उन मुद्दों को उठाया जिन्हें बड़े शहरों के अखबारों ने अक्सर अनदेखा किया। उसने किसानों की दुर्दशा, शिक्षा की कमी, श्रमिकों के शोषण, युवाओं की बेरोज़गारी और सामाजिक विषमता जैसे विषयों को प्राथमिकता दी। ‘चिंगारी’ के पन्नों पर खबरें केवल शब्द नहीं थीं—वे संवेदना, साहस और संघर्ष की साक्षी थीं।
बाबू सिंह चौहान की लेखनी में एक अजीब ऊर्जा थी। वे सत्ता से टकराने से कभी नहीं डरते थे। उन्होंने स्थानीय प्रशासन से लेकर राज्य सरकार तक उन सभी विषयों को उजागर किया जिनसे जनता प्रभावित होती थी। यही कारण था कि बिजनौर और उसके आस-पास के जिलों में ‘चिंगारी’ को जनता का अखबार कहा जाने लगा। लोगों को विश्वास था कि यदि उनकी समस्या किसी तक पहुंचेगी तो वह ‘चिंगारी’ के माध्यम से ही होगी। इस प्रकार, यह अखबार केवल समाचार का माध्यम नहीं रहा, बल्कि लोकतांत्रिक भागीदारी का प्रतीक बन गया।
समय बदला, तकनीक आई, और पत्रकारिता का स्वरूप विकसित होता गया। लेकिन ‘चिंगारी’ ने अपने मूल्यों को कभी नहीं छोड़ा। सच्चाई, निष्ठा और जनसेवा—ये तीन स्तंभ उसके हर अंक में झलकते रहे। चार दशकों तक साप्ताहिक पत्र के रूप में प्रकाशित होने के बाद, ‘चिंगारी’ ने अपने विकास के अगले चरण में प्रवेश किया और ‘संध्या दैनिक’ के रूप में परिवर्तित हुआ। यह केवल नाम या स्वरूप का परिवर्तन नहीं था—यह उस विचार की परिपक्वता थी जिसने पत्रकारिता को जनसेवा का माध्यम माना था। संध्या दैनिक के रूप में यह अखबार दिनभर की घटनाओं को नए दृष्टिकोण से प्रस्तुत करने लगा, जिसमें विश्लेषण, संवेदना और स्थानीय सरोकारों का समुचित संतुलन था।
इसके बाद, ‘बिजनौर टाइम्स’ के रूप में एक नया प्रातःकालीन संस्करण आरंभ हुआ। इस प्रकार, एक ही समूह दिन और शाम—दोनों समय जनता तक समाचार पहुंचाने का माध्यम बन गया। सुबह की खबरों में जहाँ राष्ट्रीय और वैश्विक दृष्टि झलकती थी, वहीं शाम की ‘चिंगारी’ में स्थानीय जीवन की गहराइयाँ, जनसरोकारों की प्रतिध्वनियाँ और क्षेत्रीय आत्मा की झंकार मिलती थी। यह संयोजन अद्वितीय था—एक ओर विवेक की रोशनी, दूसरी ओर जनभावना की ज्वाला।
1975 का दौर—भारत के लोकतांत्रिक इतिहास का सबसे चुनौतीपूर्ण अध्याय। जब आपातकाल ने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को जकड़ लिया, जब प्रेस पर सेंसरशिप के शिकंजे कस दिए गए। अनेक अखबार या तो मौन हो गए या सत्ता के दबाव में झुक गए। लेकिन ‘चिंगारी’ ने अपने नाम के अनुरूप अपनी लौ को मंद नहीं होने दिया। बाबू सिंह चौहान और उनकी निर्भीक टीम ने सरकारी दबाव, संसाधनों की कमी और भय के वातावरण के बावजूद सच को छुपने नहीं दिया। उन्होंने सिद्ध किया कि पत्रकारिता केवल एक व्यवसाय नहीं, बल्कि एक राष्ट्रधर्म है।
बिजनौर जैसे छोटे जनपद से निकलकर यह अखबार उस समय भी लोकतंत्र की आत्मा की रक्षा कर रहा था। जब देश में भय का वातावरण था, तब ‘चिंगारी’ के संपादकीय लेख पाठकों में साहस और विश्वास भर रहे थे। यह पत्र उन असंख्य आवाज़ों का प्रतिनिधि बना जो उस समय दबा दी गई थीं।
धीरे-धीरे ‘चिंगारी’ बिजनौर की आत्मा बन गई। उसने खेतों से लेकर पाठशालाओं तक, चौपालों से लेकर अदालतों तक हर जगह अपनी उपस्थिति दर्ज की। चाहे किसानों के अधिकारों की लड़ाई हो, बाढ़-सूखे का संकट, शिक्षा और स्वास्थ्य की स्थिति या रोजगार का सवाल—‘चिंगारी’ ने हर मुद्दे को आवाज़ दी। यह अखबार केवल घटनाओं का दस्तावेज़ नहीं बना, बल्कि जनता के संघर्षों का इतिहास बन गया।
उसके लेख केवल सूचना नहीं देते थे, बल्कि विचारों को जन्म देते थे, संवाद को दिशा देते थे और समाज को जागरूक बनाते थे। उसने यह साबित किया कि पत्रकारिता केवल खबरों का संग्रह नहीं, बल्कि समाज की अंतरात्मा का प्रतिबिंब है।
आज जब पत्रकारिता पर TRP, विज्ञापन और राजनीतिक झुकाव के साये मंडरा रहे हैं, तब भी ‘चिंगारी’ और ‘बिजनौर टाइम्स’ अपनी मूल निष्ठा पर अडिग हैं। उन्होंने न कभी सनसनीखेज़ी का सहारा लिया, न झूठे प्रचार का जाल बुना। उन्होंने केवल सत्य, समाजहित और जनकल्याण को अपना मार्गदर्शन माना। यही कारण है कि यह अखबार आज भी जनता के विश्वास, स्नेह और सम्मान का प्रतीक है।
उनके पन्नों पर छपे शब्द आज भी वही गरिमा रखते हैं जो किसी बड़े महानगर के अखबार में नहीं मिलती—क्योंकि वे शब्द किसी विज्ञापनदाता के लिए नहीं, बल्कि जनता के लिए लिखे जाते हैं।
बिजनौर जैसे जनपद से निकलकर ‘चिंगारी’ ने यह सिद्ध किया कि पत्रकारिता की शक्ति उसकी ईमानदारी में निहित होती है, न कि उसके संसाधनों में। यह अखबार भले सीमित साधनों से चलता रहा, पर उसके विचार असीम रहे। उसने न केवल पत्रकारिता की परंपरा को जीवित रखा, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए आदर्श स्थापित किया।
आज बिजनौर में जो भी युवा पत्रकार कलम उठाता है, उसकी प्रेरणा कहीं न कहीं ‘चिंगारी’ की उसी ज्योति से मिलती है जो 1950 में प्रज्वलित हुई थी।
चार दशकों से अधिक की इस अद्भुत यात्रा में ‘चिंगारी’ ने केवल खबरें नहीं दीं, बल्कि इतिहास लिखा है—वह इतिहास जिसमें एक छोटे शहर की कलम ने लोकतंत्र के सबसे बड़े आदर्शों को जिया। आज भी जब शाम ढलती है और ‘चिंगारी’ का नया अंक पाठकों के हाथों में आता है, तो उसमें केवल शब्द नहीं होते—उसमें होती है सच्चाई की लौ, साहस की गर्मी और विचारों की रोशनी।
यह अखबार हर अंक के साथ यह याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल संसद और विधानसभाओं में नहीं बसता—वह उन कलमों में जीवित रहता है जो सत्ता से प्रश्न पूछने का साहस रखती हैं।
आज जब डिजिटल युग का शोर बढ़ रहा है, जब खबरें सेकंडों में मोबाइल स्क्रीन पर आ जाती हैं, तब भी ‘चिंगारी’ का अस्तित्व यह प्रमाण है कि विश्वसनीयता की कोई वैकल्पिक तकनीक नहीं होती। उसकी सादगी, उसकी सत्यनिष्ठा और उसके लेखों की मानवीय गहराई उसे आज भी प्रासंगिक बनाए हुए हैं।
बिजनौर के जनमानस में यह अखबार केवल समाचार पत्र नहीं, बल्कि एक भावना बन चुका है—एक ऐसी भावना जो सत्य, न्याय और लोकसेवा के आदर्शों से संचालित है।
‘चिंगारी’ आज भी जल रही है—पहले से अधिक प्रखर, पहले से अधिक उज्ज्वल। क्योंकि यह केवल एक अखबार नहीं, बल्कि उस अमर विचार का प्रतीक है कि सत्य की आवाज़ कभी दबाई नहीं जा सकती। इसके संपादक द्वय श्री चंद्रमणि जी एवं सूर्यमणि बिजनौर के लिए एक थाती है l एक जीती जागती जिजीविषा हैं, जो आम जन की आवाज़ बनकर उभरते हैं l
यह लौ तब तक जलती रहेगी जब तक इस धरती पर कोई ऐसा नागरिक रहेगा जो अन्याय के खिलाफ बोलने, सच को लिखने और समाज को जगाने का साहस रखता है। और हर बार जब इतिहास पत्रकारिता के महान अध्यायों की गिनती करेगा, तब बिजनौर की यह ‘चिंगारी’ उसमें सदा प्रखर रूप से चमकेगी—एक ऐसी रोशनी के रूप में, जिसने सच्चाई को शब्द दिए और लोकतंत्र को आत्मा।
- राहुल नील







