चिंगारी: नकारात्मकता के अंधेरे में आशा की एक किरन है – इक़बाल हिंदुस्तानी

आज का मीडिया दो अलग अलग हिस्सो में बंटा नज़र आता है। एक बड़ा हिस्सा जो मुख्यधारा का मीडिया कहलाता है लेकिन जनता का भरोसा लगभग पूरी तरह से खो चुका है। दूसरा चिंगारी जैसा आंचलिक लघु एवं मीडियम न्यूज़ पेपर जो अपने सीमित साधनों के साथ अपने जनवादी समाजवादी और सेकुलर मूल्यों के लिये संघर्ष करता हुआ आज के नकरात्मकता के अंधेरे में आशा की एक किरन बनकर मानवता नैतिक मूल्यों और उसूलों के लिये अपना सब कुछ अर्पित करने को तैयार रहता है। आज के पूंजीवादी दौर में जब छोटी मछली को लगातार बड़ी मछली अपना शिकार बना रहीं हैं। इस भौतिकतावादी सोच से मीडिया भी नहीं बचा है। लेकिन हिंदी अखबार चिंगारी सांध्य दैनिक ने ऐसे में भी अपनी विश्वसनीयता जनपक्षधरता और निष्पक्षता के बल पर खुद को अवमूल्यन के अंधेरे में मशाल बनाया हुआ है। जबकि तथाकथित बड़े अख़बार और चैनल सत्य तथ्य और प्रमाण की जगह झूठ घृणा और सत्ता का प्रचार कर रहे हैं।
-इक़बाल हिंदुस्तानी
जो मीडिया कभी आम आदमी के लिये सच की मिसाल देने के काम आता था। मिसाल के तौर पर आप किसी से कहते थे कि हमारे पड़ौसी देश में सरकार का तख़्तापलट हो गया तो सामने वाला जब यकीन नहीं करता था तो आप कहते थे कि यह ख़बर अखबार और टीवी चैनल पर आ रही है। इतना सुनते ही आपकी बात सही मान ली जाती थी। लेकिन आज इसका उल्टा हो रहा है। आज उसको लोग पक्षपात बेईमानी और झूठी सूचनाओं के लिये गाली देने के तौर पर गोदी मीडिया कहने लगे हैं। आज मुख्य धारा के अख़बारों और टीवी चैनल का खास एजेंडा सरकार की चापलूसी करना उसकी नाकामी छिपाना हिंदू मुस्लिम के बीच नफ़रत फैलाना फर्जी और नकली मुद्दों पर गुमराह करने वाला झूठा नैरेटिव खड़ा करना अधिक नज़र आता है। इसके बावजूद बेशर्मी और ढीटता की हालत यह है कि सुप्रीम कोर्ट हाईकोर्ट और निष्पक्ष सिविल सोसायटी की अनेक संस्थाओं द्वारा रंगेहाथ पकड़कर फटकार लगाने ज़लील करने और कई मामलों में माफी मांगने को मजबूर करने के बाद भी मीडिया विपक्ष निष्पक्ष और मानव अधिकारवादी संगठनों को झूठा बदनाम करने में लगा हुआ है।
25 अक्तूबर 1985 को जब प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री स्व. वीर बहादुर सिंह ने बिजनौर टाइम्स ग्रुप के इवनिंग एडिशन चिंगारी दैनिक का विमोचन किया तो इन पंक्तियों का लेखक भी उस समारोह में ग्रुप के एक प्रशिक्षु पत्रकार के तौर पर वहां मौजूद था। उस समय चिंगारी के संरक्षक और सर्वेसर्वा वरिष्ठ पत्रकार चिंतक व विचारक स्व. बाबू सिंह चैहान से उनके कुछ मित्रों और शुभचिंतकों ने बिना किसी लाग लपेट के कहा था कि चिंगारी का भविष्य उज्जवल नहीं है। उनकी भावना आगाह करने को अच्छी भले ही रही होगी। लेकिन उनको पूरी आशंका इस बात की थी कि शाम का अखबार वह भी दैनिक चलाना और भी कठिन ही नहीं एक तरह से नामुमकिन काम है। लेकिन अपनी धुन के पक्के वामपंथी सोच के पैरोकार स्व. चैहान साहब ने नकारात्मक बातों पर कान न देकर अपना मिशन शुरू कर दिया। शुरू में उनके बड़े पुत्र श्री चंद्रमणि रघुवंशी ने चिंगारी के संपादन की जिम्मेदारी बखूबी निभाई। कुछ समय बाद उनके छोटे पुत्र मिलनसार इंसान श्री सूर्यमणि रघुवंशी ने चिंगारी का संपादन पूरी तैयारी के साथ अपने हाथ में लिया तो चिंगारी की चमक दिन ब दिन और तेजी से बढ़ने लगी। इसमें कोई दो राय नहीं चिंगारी का 40 साल का सफर उसके साइज उसके कागज या उसकी छपाई की किसी खास तकनीक की वजह से नहीं बल्कि पाठकों में उसकी विश्वसनीयता की वजह से आगे बढ़ता गया है।
चिंगारी के हैडिंग शेर ओ शायरी की तरह रदीफ काफिये के हिसाब से तुकांत होने को लोगों ने हाथो हाथ लिया। चिंगारी लोगों के लिये चटपटी और गुदगुदाने वाली खबरोें के साथ ही शाम की चाय का साथी बन गया। इसके बाद इसमें खबरों का ऐसा सैलाब आया कि इसके पन्ने लगातार बढ़ाने पड़े। लेकिन कीमत थोड़ी ही बढ़ाई गयी। एक दिन ऐसा आया कि जो बड़े पत्रकार और अखबार चिंगारी को हिकारत की निगाह से देखते थे और इसके जल्दी ही बंद होने का एलान कर रहे थे। उनको निराशा हाथ लगी। चिंगारी दिन दूनी रात चैगुनी तरक्की करता गया। हालत यह हो गयी कि बड़े अखबार और चैनल तक इसकी खबरों की स्टाइल की नकल करने लगे। कुछ कथित बड़े ब्रांड समझे जाने वाले मीडिया हाउसों को तो इसकी शाम को सबसे पहले छपने वाली खबरों से अपनी अहम खबरें न छूटने का एलर्ट भी मिलने लगा है। चिंगारी आज के स्वार्थ के दौर में भी पूरी तरह व्यसवायिक तौर तरीके नहीं अपनाता है। चिंगारी अपने संस्थापक और राष्ट्रीय स्तर के मूर्धन्य पत्रकार रहे स्व. चैहान साहब के दिखाये गरीब और कमजोर समर्थक रास्ते पर आज भी तमाम कठिनाइयों के बावजूद चल रहा है। पीडीएफ विकल्प आने से इसके पाठकोें की तादाद ही नहीं बढ़ी बल्कि इसके सहयोगी संवाददाता विज्ञापनदाता और शुभचिंतक भी इसके तेवर और इसके संपादक सूर्यमणि भाई की खुशअखलाकी डाउन टू अर्थ छवि सादगी नफासत सदाकत और सहाफत के लोग कायल होेते गये।
कोई माने या ना माने आज के प्रतिस्पर्धा महंगाई और तमाम तरह के दबाव के दौर में चिंगारी जैसा अखबार लगातार तीन दशक से अधिक से चलाये रखना एक तरह से लोहे के चने चबाने जैसा ही है। चिंगारी की निष्पक्षता निडरता और स्पश्टता के तो उसके आलोचक भी कायल हैं। चिंगारी की सबसे बड़ी खूबी यही है कि वह सच और न्याय के मामले में किसी से समझौता नहीं करता है। चिंगारी आज भी सरकार से अधिक अपने पाठकों आम जनता के विज्ञापनदाताओं और शुभचिंतकों से मिलने वाले सहयोग पर चल रहा है। सही बात तो यह है कि जिस चिंगारी को पुरस्कार मिलना चाहिये उसको आर्थिक दंड मिल रहा है। सबको पता है कि आज के दौर में अख़बार निकालना और उसको बेचकर जनहित की पत्रकारिता करना घाटे का सौदा है। लागत के हिसाब से देखा जाये तो किसी अख़बार के जितने पेज होते हैं। उसकी लागत लगभग उतने ही रूपये रोज़ की आती है। ज़ाहिर बात है कि इतने अधिक मूल्य पर कोई भी समाचार पत्र बिकता नहीं है। ऐसे में किसी भी न्यूज़ पेपर को मजबूरन विज्ञापनों पर निर्भर होना पड़ता है। यह भी स्पश्ट है कि आज सबसे बड़ी विज्ञापनदाता इकाई सरकार और उससे जुड़े काॅरपोरेट व अन्य अर्धशासकीय संस्थायें ही हैं। पहले सरकार कभी कभी किसी किसी मामले में मीडिया में दख़ल देती थी। उसको अपवाद मानकर मीडिया भी पचा लेता था। लकिन आज सरकार की हालत यह है कि वह विज्ञापन देकर एक तरह से मीडिया को अपना गुलाम समझने लगी है। ऐसे में चिंगारी जैसे दुस्साहसी परोपकारी और निष्पक्ष अख़बार को बार बार सलाम करता हूं। इसके संपादक प्रकाशक लेखक संवाददाता विज्ञापनदाता कर्मचारी और किसी भी तरह के सहयोगी एक मिशन के सिपाही हैं, हम उनकी भावना का सम्मान करते हैं। ऐसा लगता है कि चिंगारी आज के दौर को ललकार रहा है-

तुम्हारी सोच के सांचे में ढल नहीं सकता,
ज़्बान काट लो लहजा बदल नहीं सकता।
मुझे भी मोम का पुतला समझ रहे हो क्या,
तुम्हारी लौ से ये लोहा पिघल नहीं सकता।।

  • इक़बाल हिंदुस्तानी

    नोट- लेखक पब्लिक आब्ज़र्वर के चीफ एडिटर और नवभारत टाइम्स डाॅटकाम के ब्लाॅगर हैं।