नितिन गडकरी के ड्रीम प्रोजेक्ट ठंडे बस्ते में, सैटेलाइट से टोल वसूली योजना स्थगित, निजता और सुरक्षा की चिंता के बीच सरकार का बड़ा फैसला

केंद्र सरकार की बहुप्रतिक्षित योजना, जिसमें राष्ट्रीय राजमार्गों पर सैटेलाइट तकनीक के जरिए टोल टैक्स वसूली की बात कही गई थी, अब ठंडे बस्ते में डाल दी गई है। यह योजना “जितनी दूरी, उतना टोल” के सिद्धांत पर आधारित थी और इसके तहत देशभर के टोल प्लाजा को समाप्त कर वाहनों से सीधे बैंक खाते के माध्यम से टोल राशि काटने का प्रावधान था। लेकिन नागरिकों की निजता, डेटा सुरक्षा और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े गंभीर सवालों के चलते सरकार ने इसे स्थगित कर दिया है।

योजना का मूल स्वरूप

इस तकनीक को जीएनएसएस (Global Navigation Satellite System) आधारित टोलिंग कहा जाता है। इसके तहत हर वाहन में एक ऑन-बोर्ड यूनिट (OBU) लगाया जाना अनिवार्य था। यह डिवाइस वाहन की लोकेशन, गति, रूट, स्टॉपेज और गंतव्य जैसी जानकारी लगातार रिकॉर्ड करता। जब वाहन राष्ट्रीय राजमार्ग पर चलता, तो सैटेलाइट के जरिए तय की गई दूरी के अनुसार टोल राशि सीधे वाहन मालिक के बैंक खाते से कट जाती।

सरकार का उद्देश्य था कि टोल प्लाजा पर लगने वाली लंबी कतारों से छुटकारा मिले, यात्रा का समय घटे और राजमार्गों पर निर्बाध आवाजाही सुनिश्चित हो।

निजता और सुरक्षा की चिंता

हालांकि इस योजना के साथ सबसे बड़ी चुनौती नागरिकों की निजता और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ी थी। अधिकारियों ने स्पष्ट किया कि यदि हर वाहन की लोकेशन और मूवमेंट का डेटा लगातार रिकॉर्ड होगा, तो इसका दुरुपयोग होने की आशंका बनी रहेगी।

  • आम नागरिकों के निजी जीवन में दखल का खतरा
  • वीआईपी मूवमेंट और संवेदनशील यात्राओं की जानकारी लीक होने की संभावना
  • डेटा हैकिंग या निगरानी से राष्ट्रीय सुरक्षा को गंभीर जोखिम

इन्हीं चिंताओं को देखते हुए सरकार ने फिलहाल इस योजना को स्थगित करने का निर्णय लिया।

ट्रायल और अनुभव

इस तकनीक का ट्रायल पहले ही किया जा चुका था। बेंगलुरु-मैसूर एक्सप्रेसवे और हरियाणा के कुछ हिस्सों में इसे प्रयोगात्मक तौर पर लागू किया गया। ट्रायल के दौरान तकनीक ने दूरी के आधार पर टोल राशि काटने की क्षमता दिखाई, लेकिन साथ ही निजता और सुरक्षा संबंधी सवाल भी उठे।

सरकार की आधिकारिक सफाई

अप्रैल 2025 में सड़क परिवहन एवं राजमार्ग मंत्रालय ने स्पष्ट किया था कि 1 मई से सैटेलाइट आधारित टोलिंग प्रणाली लागू करने का कोई निर्णय नहीं लिया गया है। मंत्रालय ने कहा कि मीडिया रिपोर्ट्स में जो दावा किया गया था, वह गलत है। एनएचएआई ने राष्ट्रव्यापी स्तर पर इस प्रणाली को लागू करने की कोई योजना नहीं बनाई थी।

अब एएनपीआर पर फोकस

सैटेलाइट आधारित प्रणाली को स्थगित करने के बाद सरकार अब ऑटोमैटिक नंबर प्लेट रिकग्निशन (ANPR) तकनीक पर काम कर रही है। इस प्रणाली में वाहनों में किसी अतिरिक्त डिवाइस की आवश्यकता नहीं होगी।

  • हाईवे पर लगे कैमरे वाहनों की नंबर प्लेट पढ़ेंगे
  • मौजूदा फास्टैग वॉलेट से ही टोल राशि काट ली जाएगी
  • टोल प्लाजा पर बाधा-मुक्त आवाजाही सुनिश्चित होगी

यह तकनीक अपेक्षाकृत सरल है और इसमें नागरिकों की निजता से जुड़े खतरे भी कम हैं, क्योंकि इसमें वाहन की लोकेशन या व्यक्तिगत डेटा का रिकॉर्ड नहीं रखा जाता।

व्यापक प्रभाव और भविष्य की दिशा

सैटेलाइट आधारित टोलिंग का विचार आधुनिक और तकनीकी दृष्टि से आकर्षक था। इससे राजमार्गों पर टोल प्लाजा हटाने और यात्रा को पूरी तरह निर्बाध बनाने की उम्मीद थी। लेकिन भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण देश में जहां डेटा सुरक्षा और निजता को लेकर संवेदनशीलता बढ़ रही है, वहां इस तरह की तकनीक को लागू करना चुनौतीपूर्ण है।

सरकार का यह कदम यह दर्शाता है कि तकनीकी नवाचारों को अपनाने से पहले नागरिकों की निजता और राष्ट्रीय सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता दी जाएगी। भविष्य में यदि डेटा सुरक्षा के मजबूत उपाय विकसित होते हैं, तो संभव है कि इस योजना पर फिर से विचार किया जाए।

सैटेलाइट आधारित टोल प्रणाली फिलहाल स्थगित कर दी गई है, लेकिन यह भारत के परिवहन क्षेत्र में तकनीकी बदलाव की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयोग था। सरकार अब एएनपीआर जैसी अपेक्षाकृत सुरक्षित और सरल तकनीक पर ध्यान केंद्रित कर रही है। यह निर्णय इस बात का संकेत है कि तकनीकी प्रगति और नागरिकों की निजता के बीच संतुलन बनाना ही किसी भी नीति की सफलता की कुंजी है।