कर्नाटक कांग्रेस में मुख्यमंत्री पद की जंग: सियासी समीकरण और हाईकमान की चुनौती

कर्नाटक की राजनीति इन दिनों बेहद गर्म है। कांग्रेस सरकार बनने के बाद से ही मुख्यमंत्री पद को लेकर दो दिग्गज नेताओं—सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार—के बीच खींचतान लगातार चर्चा में रही है। यह विवाद अब अपने चरम पर पहुंच गया है और पार्टी हाईकमान को मजबूरन सक्रिय भूमिका निभानी पड़ रही है।

विधानसभा चुनावों में कांग्रेस की जीत के बाद सिद्धारमैया को मुख्यमंत्री बनाया गया था, जबकि डीके शिवकुमार को उपमुख्यमंत्री पद मिला। उस समय यह कहा गया था कि दोनों नेताओं के बीच सत्ता हस्तांतरण का समझौता हुआ है—यानी आधे कार्यकाल के बाद मुख्यमंत्री पद डीके शिवकुमार को सौंपा जाएगा। लेकिन अब तक इस वादे पर अमल नहीं हुआ है। यही कारण है कि शिवकुमार का खेमाअपना दबाव बढ़ा रहा है और राहुल गांधी से मुलाकात को अपनी जीत मान रहा है।

दिल्ली में हाईकमान की हलचल

गुरुवार को दिल्ली में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे और राहुल गांधी के बीच कर्नाटक की स्थिति पर अहम चर्चा हुई। सूत्रों के मुताबिक, 29 नवंबर को सिद्धारमैया और डीके शिवकुमार को दिल्ली बुलाया जा सकता है, ताकि इस विवाद का समाधान निकाला जा सके। यह बैठक दोनों नेताओं के लिए निर्णायक साबित हो सकती है, क्योंकि उन्हें अपनी बात सीधे राहुल गांधी और खरगे के सामने रखनी होगी।

सिद्धारमैया की रणनीति

सिद्धारमैया ने अपने घर पर एक महत्वपूर्ण बैठक बुलाई, जिसमें गृह मंत्री जी. परमेश्वर, मंत्री सतीश जारकीहोली, एच.सी. महादेवप्पा, वेंकटेश और पूर्व मंत्री के.एन. राजन्ना शामिल हुए। बैठक में इस बात पर चर्चा हुई कि अगर पार्टी तीसरे विकल्प पर विचार करती है तो हाईकमान के सामने किन मुद्दों को रखा जाए। सिद्धारमैया के पास विधायकों का बड़ा समर्थन है और उनकी पिछड़े वर्ग के नेता के रूप में लोकप्रियता उन्हें मजबूत स्थिति में रखती है। उनकी जनाधार वाली छवि के चलते उन्हें हटाना आसान नहीं माना जा रहा।

डीके शिवकुमार का दबाव

दूसरी ओर, डीके शिवकुमार भी जानते हैं कि सिद्धारमैया जैसे लोकप्रिय नेता को हटाना आसान नहीं है। अगर फैसला कांग्रेस विधायक दल पर छोड़ दिया जाता है, तो उनकी मुश्किलें बढ़ सकती हैं क्योंकि अधिकांश विधायक सिद्धारमैया के साथ हैं। इसी वजह से शिवकुमार का खेमाअब हर विधायक से व्यक्तिगत संपर्क कर रहा है। उनके भाई और पूर्व सांसद डीके सुरेश इस जिम्मेदारी को संभाल रहे हैं। शिवकुमार ने मीडिया से कहा है कि अगर हाईकमान बुलाएगा तो वे जरूर जाएंगे, लेकिन कब बुलाया जाएगा, इसकी जानकारी उन्हें नहीं है।

आगे की राह

29 नवंबर की बैठक से पहले के दो दिन दोनों नेताओं के लिए बेहद अहम हैं। माना जा रहा है कि जो नेता राहुल गांधी को ज्यादा भरोसा दिला पाएगा, वही विजेता बनकर उभरेगा। हाईकमान इस विवाद को जल्द सुलझाना चाहता है ताकि सरकार की स्थिरता पर कोई असर न पड़े। अगर समझौता नहीं होता है, तो पार्टी किसी तीसरे चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने पर भी विचार कर सकती है।