सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: गोद लेने वाली माताओं को मिलेगा 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश

भारत के सुप्रीम कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण और ऐतिहासिक निर्णय सुनाया है, जिसने गोद लेने वाली माताओं के अधिकारों को मजबूती दी है। अब किसी भी उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली महिला को 12 हफ्ते का मातृत्व अवकाश मिलेगा। यह फैसला मातृत्व को जैविक जन्म तक सीमित न मानते हुए, गोद लेने को भी मातृत्व का संवैधानिक विस्तार मानता है।

पहले क्या था प्रावधान?

पहले “मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961” और बाद में “कोड ऑन सोशल सिक्योरिटी, 2020” की धारा 60(4) के तहत यह प्रावधान था कि केवल तीन महीने से कम उम्र के बच्चे को गोद लेने वाली मां को ही मातृत्व अवकाश मिलेगा। इसका मतलब यह हुआ कि अधिकांश मामलों में, जहां बच्चे बड़े होते हैं और संस्थागत देखभाल से गोद लिए जाते हैं, माताओं को यह अधिकार नहीं मिल पाता था।

सुप्रीम कोर्ट ने क्यों बदला नियम?

सुप्रीम कोर्ट की बेंच ने इस प्रावधान को असंवैधानिक घोषित करते हुए कहा कि यह भेदभावपूर्ण है और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) और अनुच्छेद 21 (जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार) का उल्लंघन करता है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि मातृत्व अवकाश का उद्देश्य बच्चे और मां दोनों को नए वातावरण में ढलने और भावनात्मक जुड़ाव बनाने का अवसर देना है। यह इस बात पर निर्भर नहीं करता कि बच्चा किस उम्र में परिवार में आता है।

बच्चे के हित को सर्वोपरि माना गया

कोर्ट ने कहा कि बड़े बच्चों को नए परिवार में भावनात्मक रूप से घुलने-मिलने में अधिक समय लगता है। ऐसे में मातृत्व अवकाश केवल छोटे बच्चों तक सीमित करना अनुचित है। बच्चे का सर्वोत्तम हित ही सबसे महत्वपूर्ण होना चाहिए, और मातृत्व अवकाश इसी प्रक्रिया को आसान बनाता है।

पैटरनिटी लीव पर भी विचार

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र सरकार को यह भी सुझाव दिया कि वह पितृत्व अवकाश (Paternity Leave) पर नीति बनाए। इससे देखभाल की जिम्मेदारी केवल महिलाओं तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि एक लिंग-तटस्थ और समावेशी दृष्टिकोण विकसित होगा।

याचिका किसने दायर की थी?

यह फैसला कर्नाटक की वकील हमसानंदिनी नंदुरी की याचिका पर आया। उन्होंने इस प्रावधान को चुनौती दी थी और इसे मनमाना व भेदभावपूर्ण बताया था। उनकी दलील थी कि भारत में गोद लेने की प्रक्रिया में तीन महीने से कम उम्र के बच्चों को गोद लेना लगभग असंभव है, जिससे यह प्रावधान व्यावहारिक रूप से निरर्थक हो जाता है।

सुप्रीम कोर्ट का यह फैसला न केवल गोद लेने वाली माताओं के अधिकारों को मान्यता देता है, बल्कि भारतीय समाज में मातृत्व की व्यापक समझ को भी मजबूत करता है। यह निर्णय दिखाता है कि मातृत्व केवल जैविक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि बच्चे को अपनाने और उसे परिवार का हिस्सा बनाने की संवेदनशील यात्रा भी है। साथ ही, यह फैसला भारत में अधिक समावेशी और संवेदनशील सामाजिक नीतियों की दिशा में एक बड़ा कदम है।