“चिंगारी” , श्रम, संघर्ष, सेवा और साधना के 40 साल – ‘सूर्यमणि रघुवंशी’
40 साल यानि 4 दशक की अनवरत यात्रा को अगर 4 शब्दों में व्यक्त करूं, तो वे हैं- श्रम, संघर्ष, सेवा और साधना। इन 40 वर्षों में कोई एक दिन याद नहीं आता, जब खुद को तपाये बिना भोजन नसीब हुआ हो और बिना किसी दुश्वारी के सहजता के साथ चिंगारी छपा हो। कभी आर्थिक समस्या, तो कभी तकनीकी प्रॉब्लम। कभी कार्मिकों की अनुपलब्धता, तो कभी विरोधियों के प्रपंच। फिर भी हम चलते रहे…बिना थके, बिना रूके। नमन उन सब चरणों में, जो इस यात्रा में हमारे साथ क़दम से क़दम मिलाकर चले। पाठकों का आभार व्यक्त करने के लिये मेरे पास शब्द नहीं हैं। थैंक्यू, आभार या धन्यवाद कहकर मैं उस रिश्ते को छोटा नहीं करना चाहता, जो पाठकों और चिंगारी का है। बड़े कहे जाने वाले अ$खबार भी तरसते हैं ऐसे अटूट रिश्ते के लिये। हजारों पाठक ऐसे हैं, जो पहले दिन से चिंगारी पढ़ते आ रहे हैं और अब उनकी दूसरी, तीसरी पीढ़ी इस रिश्ते को परवान चढ़ा रही है।
चिंगारी को यह भी गौरव हासिल है कि उसने पाठकों के साथ-साथ विज्ञापनदाताओं का भी भरोसा जीता है। विज्ञापनदाताओं की कसौटी पर भी चिंगारी पूरी तरह खऱा उतरा है। बहुत कम अख़्ाबार ऐसे होंगे, जिन्हें पहले दिन ही पाठकों का ऐसा प्यार मिले कि प्रतियां कम पड़ जायें। चिंगारी की तो डमी कॉपी भी बिक गई थी, जिस पर साफ-साफ लिखा था- ‘यह प्रति बिक्री के लिये नहीं’।
पीछे मुडक़र देखता हूं तो त्याग व तपस्या का एक-एक दिन रील की तरह यादों के पर्दे पर चलने लगता है। अतीत की वे तस्वीरें मस्तिष्क पर अंकित होने लगती हैं, जिनमें श्रम, संघर्ष, सेवा और साधना के रंग भरे हुए हैं। पत्रकारिता जब जनसरोकार का धर्म निभाती है, तब ही सार्थक कहलाती है। चिंगारी इस दृष्टि से अपनी पीठ थपथपाने का हक़दार है। जनपक्षधरता और धर्मनिरपेक्षता चिंगारी की पहचान है। पाठकों ने खुद महसूस किया है कि जनता के मुद्दों और पीडि़तों के दर्द के साथ चिंगारी ने कभी समझौता नहीं किया। चिंगारी को यह भी गौरव हासिल है कि उसने विषम परिस्थितियों में कभी धैर्य नहीं खोया, बल्कि समाज को सही दिशा दी है। चाहे वह कवाल काण्ड का दौर हो, या उससे पहले बाबरी मस्जिद-राम मंदिर प्रकरण को लेकर साम्प्रदायिकता का उभार रहा हो। सन् 90 के बिजनौर के भीषण दंगे में चिंगारी और उसके अभिभावक पत्र बिजनौर टाइम्स ने नफऱत व साम्प्रदायिकता की आग को बुझाने में अग्रणी/अविस्मरणीय भूमिका निभाई थी, जिसे तब दूसरे देशों के अख़बारों व पत्रकारों ने भी सराहा था।
आज प्रिंट मीडिया गंभीर संकट के दौर से गुजर रहा है। पिछले कुछ वर्षों में सैकड़ों अ$खबार पीडीएफ तक सीमित हो गये हैं। जिलों से छपने वाले कितने ही अ$खबारों का अस्तित्व ही समाप्त हो चुका है। पूंजीपतियों व कारपोरेट घरानों के भी कई अ$खबार सिमटकर रह गये हैं। ऐसे में अगर बिजनौर जैसे छोटे नगर से बेहद सीमित साधनों से निकलने वाला चिंगारी अ$खबार 40 वर्षों से लगातार न केवल छप रहा है, बल्कि लोगों के दिलों की धडक़न बना हुआ है, तो इसका सारा श्रेय सुधि पाठकों, सहृदयी विज्ञापनदाताओं, समर्पित संवाददाताओं, निष्ठावान सहकर्मियों तथा परिश्रमी एजेंटों/हॉकरों को है। इस संकल्प के साथ सभी का अभिनंदन, कि हमारी यह यात्रा जारी है, जारी रहेगी।
-सूर्यमणि रघुवंशी







